महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसौवीराः कितवाः प्राच्या दाक्षिणात्याश्च सर्वशः ।
तवात्मजं पुरस्कृत्य सूतपुत्रस्य पृष्ठतः ।। १६ ।।
हर्षयन्तः स्वसैन्यानि ययुस्तव सुतैः सह ।
मद्र, त्रिगर्त, अम्बष्ठ, प्रतीच्य, उदीच्य, मालव, शिबि, शूरसेन, शूद्र, मलद, सौवीर, कितव, प्राच्य तथा दाक्षिणात्य वीर—ये सब-के-सब आपके पुत्र दुर्योधनको आगे करके सूतपुत्र कर्णके पृष्ठभागमें रहकर अपनी सेनाओंको हर्ष प्रदान करते हुए आपके पुत्रोंके साथ चले ।।
प्रवरः सर्वयोधानां बलेषु बलमादधत् ।। १७ ।।
ययौ वैकर्तनः कर्णः प्रमुखे सर्वधन्विनाम् ।
समस्त योद्धाओंमें श्रेष्ठ विकर्तनपुत्र कर्ण सारी सेनाओंमें नूतन शक्ति और उत्साहका संचार करता हुआ सम्पूर्ण धनुर्धरोंके आगे-आगे चला ।। १७ १/२ ।।
तस्य दीप्तो महाकायः स्वान्यनीकानि हर्षयन् ।। १८ ।।
हस्तिकक्ष्यौ महाकेतुर्बभौ सूर्यसमद्युतिः ।
उसका अत्यन्त कान्तिमान् विशाल ध्वज बहुत ऊँचा था। उसमें हाथीको बाँधनेवाली साँकलका चिह्न सुशोभित था। वह ध्वज अपने सैनिकोंका हर्ष बढ़ाता हुआ सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहा था ।। १८ १/२ ।।
न भीष्मव्यसनं कश्चिद् दृष्ट्वा कर्णममन्यत ।। १९ ।।
विशोकाश्चाभवन् सर्वे राजानः कुरुभिः सह ।
कर्णको देखकर किसीको भी भीष्मजीके मारे जानेका दुःख नहीं रह गया। कौरवोंसहित सब राजा शोकरहित हो गये ।। १९ १/२ ।।
हृष्टाश्च बहवो योधास्तत्राजल्पन्त वेगताः ।। २० ।।
न हि कर्णं रणे दृष्ट्वा युधि स्थास्यन्ति पाण्डवाः ।
हर्षमें भरे हुए बहुत-से योद्धा वहाँ वेगपूर्वक बोल उठे—‘इस रणक्षेत्रमें कर्णको उपस्थित देख पाण्डवलोग ठहर नही सकेंगे ।। २० १/२ ।।
कर्णो हि समरे शक्तो जेतुं देवान् सवासवान् ।। २१ ।।
किमु पाण्डुसुतान् युद्धे हीनवीर्यपराक्रमान् ।
‘क्योंकि कर्ण समरांगणमें इन्द्रके सहित देवताओंको भी जीतनेमें समर्थ है। फिर, जो बल और पराक्रममें कर्णकी अपेक्षा निम्न श्रेणीके हैं, उन पाण्डवोंको युद्धमें पराजित करना उसके लिये कौन बड़ी बात है ।। २१ १/२ ।।
भीष्मेण तु रणे पार्थाः पालिता बाहुशालिना ।। २२ ।।
तांस्तु कर्णः शरैस्तीक्ष्णैर्नाशयिष्यति संयुगे ।