महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 787, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसम्भिन्नमर्मघण्टाश्च विनिकृत्तमहाध्वजाः । हतारोहा दिशो राजन् भेजिरे भ्रष्टकम्बलाः ॥ २६ ॥ उन हाथियोंके दाँत टूट गये, सारे अंगोंसे खूनकी धाराएँ बहने लगीं, कुम्भस्थल और गण्डस्थल फट गये, कान, मुख और शुण्ड छिन्न-भिन्न हो गये, महावत मारे गये और ध्वजा-पताकाएँ टूटकर गिर गयीं। उनके मर्मस्थल विदीर्ण हो गये, घंटे टूट गये और विशाल ध्वज कटकर गिर पड़े। सवार मारे गये तथा झूल खिसककर गिर गये थे। राजन्! ऐसी अवस्थामें उन हाथियोंने भागकर विभिन्न दिशाओंकी शरण ली थी ॥ २५-२६ ॥ रुवन्तो विविधान् नादान् जलदोपमनिःस्वनाः । नाराचैर्वत्ससन्तैश्च भल्लैरञ्जलिकैस्तथा ॥ २७ ॥ क्षुरप्रैरर्धचन्द्रैश्च सात्वतेन विदारिताः । क्षरन्तोऽसृक् तथा मूत्रं पुरीषं च प्रदुद्रुवुः ॥ २८ ॥ उनके चिग्घाड़नेकी ध्वनि मेघोंकी गर्जनाके समान जान पड़ती थी। वे सात्यकिके चलाये हुए नाराच, वत्ससन्त, भल्ल, अंजलिक, क्षुरप्र और अर्द्धचन्द्र नामक बाणोंसे विदीर्ण हो नाना प्रकारसे आर्तनाद करते, रक्त बहाते तथा मल-मूत्र छोड़ते हुए भाग रहे थे ॥ २७-२८ ॥ बभ्रमुश्च स्खलुश्चान्ये पेतुर्मम्लुस्तथापरे । एवं तत् कुञ्जरानीकं युयुधानेन पीडितम् ॥ २९ ॥ शरैरग्न्यर्कसंकाशैः प्रदुद्राव समन्ततः । उनमेंसे कुछ हाथी चक्कर काटने लगे, कुछ लड़खड़ाने लगे, कुछ धराशायी हो गये और कुछ पीड़ाके मारे अत्यन्त शिथिल हो गये थे। इस प्रकार युयुधानके अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा पीड़ित हुई हाथियोंकी वह सेना सब ओर भाग गयी ॥ २९१/२ ॥ तस्मिन् हते गजानीके जलसंधो महाबलः ॥ ३० ॥ यत्तः सम्प्रापयन्नागं रजताश्वरथं प्रति । उस गजसेनाके नष्ट होनेपर महाबली जलसंध युद्धके लिये उद्यत हो श्वेत घोड़ोंवाले सात्यकिके रथके समीप अपना हाथी ले आया ॥ ३०१/२ ॥ रुक्मवर्मधरः शूरस्तपनीयाङ्गदः शुचिः ॥ ३१ ॥ कुण्डली मुकुटी खड्गी रक्तचन्दनरूषितः । शिरसा धारयन् दीप्तां तपनीयमयीं स्रजम् ॥ ३२ ॥ उरसा धारयन् निष्कं कण्ठसूत्रं च भास्वरम् ।