भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 788

शूरवीर एवं पवित्र जलसंधने अपने शरीरमें सोनेका कवच धारण कर रखा था। उसकी दोनों भुजाओंमें सोनेके ही बाजूबंद शोभा पा रहे थे। दोनों कानोंमें कुण्डल और मस्तकपर किरीट चमक रहे थे। उसके हाथमें तलवार थी और सम्पूर्ण शरीरमें रक्त चन्दनका लेप लगा हुआ था। उसने अपने सिरपर सोनेकी बनी हुई चमकीली माला और वक्षःस्थलपर प्रकाशमान पदक एवं कण्ठहार धारण कर रखे थे ।। ३१-३२१/२ ।।

चापं च रुक्मविकृतं विधुन्वन् गजमूर्धनि ।। ३३ ।।
अशोभत महाराज सविद्युदिव तोयदः ।
महाराज! हाथीकी पीठपर बैठकर अपने सोनेके बने हुए धनुषको हिलाता हुआ जलसंध बिजलीसहित मेघके समान शोभा पा रहा था ।। ३३१/२ ।।

तमापतन्तं सहसा मागधस्य गजोत्तमम् ।। ३४ ।।
सात्यकिर्वारयामास वेलेव मकरालयम् ।
सहसा अपनी ओर आते हुए मगधराजके उस गजराजको सात्यकिने उसी प्रकार रोक दिया, जैसे तटकी भूमि समुद्रको रोक देती है ।। ३४१/२ ।।

नागं निवारितं दृष्ट्वा शैनेयस्य शरोत्तमैः ।। ३५ ।।
अक्रुध्यत रणे राजन् जलसंधो महाबलः ।
राजन्! सात्यकिके उत्तम बाणोंसे उस हाथीको अवरुद्ध हुआ देख महाबली जलसंध रणक्षेत्रमें कुपित हो उठा ।। ३५१/२ ।।

ततः क्रुद्धो महाराज मार्गणैर्भारसाधनैः ।। ३६ ।।
अविध्यत शिनेः पौत्रं जलसंधो महोरसि ।
महाराज! क्रोधमें भरे हुए जलसंधने भार सहन करनेमें समर्थ बाणोंद्वारा शिनिपौत्र सात्यकिकी विशाल छातीपर गहरा आघात किया ।। ३६१/२ ।।

ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च ।। ३७ ।।
अस्यतो वृष्णिवीरस्य निचकर्त शरासनम् ।
तत्पश्चात् दूसरे तीखे, पैने और पानीदार भल्लसे उसने बाण फेंकते हुए वृष्णिवीर सात्यकिके धनुषको काट डाला ।। ३७१/२ ।।

सात्यकिं छिन्नधन्वानं प्रहसन्निव भारत ।। ३८ ।।
अविध्यन्मागधो वीरः पञ्चभिर्निशितैः शरैः ।
भारत! धनुष काटनेके पश्चात् सात्यकिको उस मागध वीरने हँसते हुए ही पाँच तीखे बाणोंद्वारा घायल कर दिया ।। ३८१/२ ।।

स विद्धो बहुभिर्बाणैर्जलसंधेन वीर्यवान् ।। ३९ ।।
नाकम्पत महाबाहुस्तदद्भुतमिवाभवत् ।