भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 790

शैनेयस्य धनुश्छित्त्वा स खड्गो न्यपतन्महीम् ।
अलातचक्रवच्चैव व्यरोचत महीं गतः ॥ ४८ ॥
वह खड्ग सात्यकिके धनुषको काटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। धरतीपर पहुँचकर वह अलातचक्रके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ ४८ ॥

अथान्यद् धनुरादाय सर्वकायावदारणम् ।
शालस्कन्धप्रतीकाशमिन्द्राशनिसमस्वनम् ॥ ४९ ॥
विस्फार्य विव्यधे क्रुद्धो जलसंधं शरेण ह ।
तब सात्यकिने साखूके तनेके समान विशाल, इन्द्रके वज्रकी भाँति घोर टंकार करनेवाले तथा सबके शरीरको विदीर्ण करनेमें समर्थ दूसरा धनुष हाथमें लेकर उसे कानतक खींचा और कुपित हो एक बाणसे जलसंधको बींध डाला ॥ ४९ १/२ ॥

ततः साभरणौ बाहू क्षुराभ्यां माधवोत्तमः ॥ ५० ॥
सात्यकिर्जलसंधस्य चिच्छेद प्रहसन्निव ।
फिर मधुवंशशिरोमणि सात्यकिने हँसते हुए-से दो छुरोंका प्रहार करके जलसंधकी आभूषणभूषित दोनों भुजाओंको काट दिया ॥ ५० १/२ ॥

तौ बाहू परिघप्रख्यौ पेततुर्गजसत्तमात् ॥ ५१ ॥
वसुंधराधराद् भ्रष्टौ पञ्चशीर्षाविवोरगौ ।
उसकी वे परिघके समान मोटी भुजाएँ उस गजराजकी पीठसे नीचे गिर पड़ीं, मानो पर्वतसे पाँच-पाँच मस्तकोंवाले दो नाग पृथ्वीपर गिरे हों ॥ ५१ १/२ ॥

ततः सुदंष्ट्रं सुमहच्चारुकुण्डलमण्डितम् ॥ ५२ ॥
क्षुरेणास्य तृतीयेन शिरश्चिच्छेद सात्यकिः ।
तदनन्तर सात्यकिने तीसरे छुरेसे उसके सुन्दर दाँतोंवाले मनोहर कुण्डलमण्डित विशाल मस्तकको काट गिराया ॥ ५२ १/२ ॥

तत्पातितशिरोबाहुकबधं भीमदर्शनम् ॥ ५३ ॥
द्विरदं जलसंधस्य रुधिरेणाभ्यषिञ्चत ।
मस्तक और भुजाओंके गिर जानेसे अत्यन्त भयंकर दिखायी देनेवाले जलसंधके उस धड़ने अपने खूनसे उस हाथीको नहला दिया ॥ ५३ १/२ ॥

जलसंधं निहत्याजौ त्वरमाणस्तु सात्वतः ॥ ५४ ॥
विमानं पातयामास गजस्कन्धाद् विशाम्पते ।
प्रजानाथ! युद्धस्थलमें जलसंधको मारकर फुर्ती करनेवाले सात्यकिने हाथीकी पीठसे उसके हौदेको भी गिरा दिया ॥ ५४ १/२ ॥

रुधिरेणावसिक्ताङ्गो जलसंधस्य कुञ्जरः ॥ ५५ ॥
विलम्बमानमवहत् संश्लिष्टं परमासनम् ।