भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 791

खूनसे भीगे शरीरवाला जलसंधका वह हाथी अपनी पीठसे सटकर लटकते हुए उस हौदेको ढो रहा था ।। ५५ १/३ ।। शरार्दितः सात्वतेन मर्दमानः स्ववाहिनीम् ।। ५६ ।। घोरमार्तस्वरं कृत्वा विदुद्राव महागजाः । सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हो वह महान् गजराज घोर चीत्कार करके अपनी ही सेनाको कुचलता हुआ भाग निकला ।। ५६ १/३ ।। हाहाकारो महानासीत् तव सैन्यस्य मारिष ।। ५७ ।। जलसंधं हतं दृष्ट्वा वृष्णीनामृषभेण तु । आर्य! वृष्णिप्रवर सात्यकिके द्वारा जलसंधको मारा गया देख आपकी सेनामें महान् हाहाकार मच गया ।। ५७ १/३ ।। विमुखाश्चाभ्यधावन्त तव योधाः समन्ततः ।। ५८ ।। पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये । आपके योद्धा शत्रुओंपर विजय पानेका उत्साह खो बैठे। अब वे भाग निकलनेमें ही उत्साह दिखाने लगे और युद्धसे मुँह मोड़कर चारों ओर भाग गये ।। ५८ १/३ ।। एतस्मिन्नन्तरे राजन् द्रोणः शस्त्रभृतां वरः ।। ५९ ।। अभ्ययाज्जवनैरश्वैर्युयुधानं महारथम् । राजन्! इसी समय शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य अपने वेगशाली घोड़ोंद्वारा महारथी युयुधानका सामना करनेके लिये आ पहुँचे ।। ५९ १/३ ।। तमुदीर्णं तथा दृष्ट्वा शैनेयं नरपुङ्गवाः ।। ६० ।। द्रोणेनैव सह क्रुद्धाः सात्यकिं समुपाद्रवन् । शिनिपौत्र सात्यकिको बढ़ते देख नरश्रेष्ठ कौरव महारथी द्रोणाचार्यके साथ ही कुपित हो उनपर टूट पड़े ।। ततः प्रवृत्ते युद्धं कुरूणां सात्वतस्य च । द्रोणस्य च रणे राजन् घोरं देवासुरोपमम् ।। ६१ ।। राजन्! फिर तो उस रणक्षेत्रमें कौरवोंसहित द्रोणाचार्य तथा सात्यकिका देवासुर-संग्रामके समान भयंकर युद्ध होने लगा ।। ६१ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे जलसंधवधो नाम पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११५ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिके कौरव-सेनामें प्रवेशके अवसरपर जलसंधका वध नामक एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११५ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६२ १/३ श्लोक हैं।)