भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 793

दुर्मर्षणं द्वादशभिरष्टाभिश्च विविंशतिम् ।
सत्यव्रतं च नवभिर्विजयं दशभिः शरैः ॥ ८ ॥
उन्होंने द्रोणाचार्यको तीन, दुःसहको नौ, विकर्णको पचीस, चित्रसेनको सात, दुर्मर्षणको बारह, विविंशतिको आठ, सत्यव्रतको नौ तथा विजयको दस बाणोंसे घायल किया ॥ ७-८ ॥

ततो रुक्माङ्गदं चापं विधुन्वानो महारथः ।
अभ्ययात् सात्यकिस्तूर्णं पुत्रं तव महारथम् ॥ ९ ॥
तदनन्तर महारथी सात्यकिने सोनेके अंगदसे विभूषित अपने विशाल धनुषको हिलाते हुए तुरंत ही आपके महारथी पुत्र दुर्योधनपर आक्रमण किया ॥ ९ ॥

राजानं सर्वलोकस्य सर्वलोकमहारथम् ।
शरैरभ्याहनद् गाढं ततो युद्धमभूत् तयोः ॥ १० ॥
सब लोगोंके राजा और समस्त संसारके विख्यात महारथी दुर्योधनको उन्होंने अपने बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी। फिर तो उन दोनोंमें भारी युद्ध छिड़ गया ॥ १० ॥

विमुञ्चन्तौ शरांस्तीक्ष्णान् संदधानौ च सायकान् ।
अदृश्यं समरेऽन्योन्यं चक्रतुस्तौ महारथौ ॥ ११ ॥
उन दोनों महारथियोंने समरभूमिमें बाणोंका संधान और तीखे बाणोंका प्रहार करते हुए एक-दूसरेको अदृश्य कर दिया ॥ ११ ॥

सात्यकिः कुरुराजेन निर्विद्धो बह्वशोभत ।
अस्रवद् रुधिरं भूरि स्वरसं चन्दनो यथा ॥ १२ ॥
सात्यकि कुरुराज दुर्योधनके बाणोंसे बिंधकर अधिक मात्रामें रक्त बहाने लगे। उस समय वे अपना रक्त बहाते हुए लाल चन्दनवृक्षके समान अधिक शोभा पा रहे थे ॥ १२ ॥

सात्वतेन च बाणौघैर्निर्विद्धस्तनयस्तव ।
शातकुम्भमयापीडो बभौ यूप इवोच्छ्रितः ॥ १३ ॥
सात्यकिके बाणसमूहोंसे घायल होकर आपका पुत्र दुर्योधन सुवर्णमय मुकुट धारण किये ऊँचे यूपके समान सुशोभित हो रहा था ॥ १३ ॥

माधवस्तु रणे राजन् कुरुराजस्य धन्विनः ।
धनुश्चिच्छेद समरे क्षुरप्रेण हसन्निव ॥ १४ ॥
राजन्! रणक्षेत्रमें सात्यकिने धनुर्धर दुर्योधनके धनुषको एक क्षुरप्रद्वारा हँसते हुए-से काट दिया ॥ १४ ॥

अथैनं छिन्नधन्वानं शरैर्बहुभिसचिनोत् ।
निर्भिन्नश्च शरैस्तेन द्विषता क्षिप्रकारिणा ॥ १५ ॥
नामृष्यत रणे राजा शत्रोर्विजयलक्षणम् ।