भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 795

तदनन्तर हर्षमें भरे हुए सात्यकिने महारथी कुरुराज दुर्योधनपर बहुत-से मर्मभेदी बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २३ ॥ स वध्यमानः समरे शैनेयस्य शरोत्तमैः । प्राद्रवत् सहसा राजन् पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥ २४ ॥ आप्लुतश्च ततो यानं चित्रसेनस्य धन्विनः । राजन्! सात्यकिके श्रेष्ठ बाणोंद्वारा समरांगणमें क्षत-विक्षत होकर आपका पुत्र दुर्योधन सहसा भागा और धनुर्धर चित्रसेनके रथपर जा चढ़ा ॥ २४ १/२ ॥ हाहाभूतं जगच्चासीद् दृष्ट्वा राजानमाहवे ॥ २५ ॥ ग्रस्यमानं सात्यकिना खे सोममिव राहुणा । जैसे आकाशमें राहु चन्द्रमापर ग्रहण लगाता है, उसी प्रकार सात्यकिद्वारा राजा दुर्योधनको ग्रस्त होते देख वहाँ सब लोगोंमें हाहाकार मच गया ॥ २५ १/२ ॥ तं तु शब्दमथ श्रुत्वा कृतवर्मा महारथः ॥ २६ ॥ अभ्ययात् सहसा तत्र यत्रास्ते माधवः प्रभुः । उस कोलाहलको सुनकर महारथी कृतवर्मा सहसा वहीं आ पहुँचा, जहाँ शक्तिशाली सात्यकि खड़े थे ॥ विधुन्वानो धनुः श्रेष्ठं चोदयंश्चैव वाजिनः ॥ २७ ॥ भर्त्सयन् सारथिं चाग्रे याहि याहीति सत्वरम् । वह अपने श्रेष्ठ धनुषको कँपाता, घोड़ोंको हाँकता और 'आगे बढ़ो, जल्दी चलो' कहकर सारथिको फटकारता हुआ वहाँ आया ॥ २७ १/२ ॥ तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य व्यादितास्यमिवान्तकम् ॥ २८ ॥ युयुधानो महाराज यन्तारमिदमब्रवीत् । महाराज! मुँह बाये हुए कालके समान कृतवर्माको वहाँ आते देख युयुधानने अपने सारथिसे कहा— ॥ २८ १/२ ॥ कृतवर्मा रथेनैष द्रुतमापतते शरी ॥ २९ ॥ प्रत्युद्याहि रथेनैनं प्रवरं सर्वधन्विनाम् । ‘सूत! यह कृतवर्मा बाण लेकर रथके द्वारा तीव्र वेगसे आ रहा है। यह सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ है। तुम रथके द्वारा इसकी अगवानी करो' ॥ २९ १/२ ॥ ततः प्रजविताश्वेन विधिवत् कल्पितेन च ॥ ३० ॥ आससाद रणे भोजं प्रतिमानं धनुष्मताम् । तदनन्तर सात्यकि विधिपूर्वक सजाये गये तेज घोड़ोंवाले रथके द्वारा रणभूमिमें धनुर्धरोंके आदर्शभूत कृतवर्माके पास जा पहुँचे ॥ ३० १/२ ॥ ततः परमसंक्रुद्धौ ज्वलिताविव पावकौ ॥ ३१ ॥