भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 796

समेयातां नरव्याघ्रौ व्याघ्राविव तरस्विनौ । तत्पश्चात् प्रज्वलित पावक और वेगशाली व्याघ्रोंके समान वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर अत्यन्त कुपित हो एक-दूसरेसे भिड़ गये ॥ ३१ १/२ ॥

कृतवर्मा तु शैनेयं षड्विंशत्या समर्पयत् ॥ ३२ ॥ निशितैः सायकैस्तीक्ष्णैर्यन्तारं चास्य पञ्चभिः । कृतवर्माने सात्यकिपर तेज धारवाले छब्बीस तीखे बाण चलाये और पाँच बाणोंद्वारा उनके सारथिको भी घायल कर दिया ॥ ३२ १/२ ॥

चतुरश्चतुरो वाहांश्चतुर्भिः परमेषुभिः ॥ ३३ ॥ अविध्यत् साधुदान्तान् वै सैन्धवान् सात्वतस्य हि । इसके बाद चार उत्तम बाण मारकर उसने सात्यकिके सुशिक्षित एवं विनीत चारों सिंधी घोड़ोंको भी बींध डाला ॥ ३३ १/२ ॥

रुक्मध्वजो रुक्मपृष्ठं महद् विस्फार्य कार्मुकम् ॥ ३४ ॥ रुक्माङ्गदी रुक्मवर्मा रुक्मपुङ्खैरवारयत् । तदनन्तर सोनेके केयूर और सोनेके ही कवच धारण करनेवाले सुवर्णमय ध्वजासे सुशोभित कृतवर्माने सोनेकी पीठवाले अपने विशाल धनुषकी टंकार करके स्वर्णमय पंखवाले बाणोंसे सात्यकिको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ३४ १/२ ॥

ततोऽशीतिं शिनेः पौत्रः सायकान् कृतवर्मणे ॥ ३५ ॥ प्राहिणोत् त्वरया युक्तो द्रष्टुकामो धनंजयम् । तब शिनिपौत्र सात्यकिने बड़ी उतावलीके साथ मनमें अर्जुनके दर्शनकी कामना लिये वहाँ कृतवर्माको अस्सी बाण मारे ॥ ३५ १/२ ॥

सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुतापनः ॥ ३६ ॥ समकम्पत दुर्धर्षः क्षितिकम्पे यथाचलः । शत्रुओंको संताप देनेवाला दुर्धर्ष वीर कृतवर्मा अपने बलवान् शत्रु सात्यकिके द्वारा अत्यन्त घायल होकर उसी प्रकार काँपने लगा, जैसे भूकम्पके समय पर्वत हिलने लगता है ॥ ३६ १/२ ॥

त्रिषष्ट्या चतुरोऽस्याश्वान् सप्तभिः सारथिं तथा ॥ ३७ ॥ विव्याध निशितैस्तूर्णं सात्यकिः सत्यविक्रमः । तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी सात्यकिने तिरसठ बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको और सात तीखे बाणोंसे उसके सारथिको भी शीघ्र ही क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ३७ १/२ ॥

सुवर्णपुङ्खं विशिखं समाधाय च सात्यकिः ॥ ३८ ॥ व्यसृजत् तं महाज्वालं संक्रुद्धमिव पन्नगम् ।