भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 797

अब सात्यकिने अपने धनुषपर सुवर्णमय पंखवाले अत्यन्त तेजस्वी बाणका संधान किया, जो क्रोधमें भरे हुए सर्पके समान प्रतीत होता था। उस बाणको उन्होंने कृतवर्मापर छोड़ दिया॥ ३८१/२॥

सोऽविध्यत् कृतवर्माणं यमदण्डोपमः शरः॥ ३९॥
जाम्बूनदविचित्रं च वर्म निर्भिद्य भानुमत्।
अभ्यगाद् धरणीमुग्रो रुधिरेण समुक्षितः॥ ४०॥
सात्यकिका वह बाण यमदण्डके समान भयंकर था। उसने कृतवर्माके सुवर्णजटित चमकीले कवचको छिन्न-भिन्न करके उसे गहरी चोट पहुँचायी तथा खूनसे लथपथ होकर वह धरतीमें समा गया॥ ३९-४०॥

संजातरुधिरश्चाजौ सात्वतेषुभिरर्दितः।
सशरं धनुरुत्सृज्य न्यपतत् स्यन्दनोत्तमात्॥ ४१॥
युद्धस्थलमें सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हो कृतवर्मा खूनकी धारा बहाता हुआ धनुष-बाण छोड़कर उस उत्तम रथसे उसके पिछले भागमें गिर पड़ा॥ ४१॥

स सिंहदंष्ट्रो जानुभ्यां पतितोऽमितविक्रमः।
शरार्दितः सात्यकिना रथोपस्थे नरर्षभः॥ ४२॥
सिंहके समान दाँतोंवाला अमितपराक्रमी नरश्रेष्ठ कृतवर्मा सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हो घुटनोंके बलसे रथकी बैठकमें गिर गया॥ ४२॥

सहस्रबाहुसदृशमक्षोभ्यमिव सागरम्।
निवार्य कृतवर्माणं सात्यकिः प्रययौ ततः॥ ४३॥
सहस्रबाहु अर्जुनके समान दुर्जय तथा महासागरके समान अक्षोभ्य कृतवर्माको इस प्रकार पराजित करके सात्यकि वहाँसे आगे बढ़ गये॥ ४३॥

खड्गशक्तिधनुःकीर्णां गजाश्वरथसंकुलाम्।
प्रवर्तितोग्ररुधिरां शतशः क्षत्रियर्षभैः॥ ४४॥
प्रेक्षतां सर्वसैन्यानां मध्येन शिनिपुङ्गवः।
अभ्यागाद्वाहिनीं हित्वा वृत्रहेवासुरीं चमूम्॥ ४५॥
जैसे वृत्रनाशक इन्द्र असुरोंकी सेनाको लाँघकर जा रहे हों, उसी प्रकार शिनिप्रवर सात्यकि सम्पूर्ण सैनिकोंके देखते-देखते उनके बीचसे होकर उस सेनाका परित्याग करके चल दिये। उस कौरव-सेनामें सैकड़ों क्षत्रिय-शिरोमणियोंने भयानक रक्तकी धारा बहा दी थी। वहाँ हाथी, घोड़े तथा रथ खचाखच भरे हुए थे और खड्ग, शक्ति एवं धनुष सब ओर व्याप्त थे॥ ४४-४५॥

समाश्र्वस्य च हार्दिक्यो गृह्य चान्यन्महद् धनुः।
तस्थौ स तत्र बलवान् वारयन् युधि पाण्डवान्॥ ४६॥