महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 873, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘भीमसेन! जिन्होंने एकमात्र रथकी सहायतासे देवताओंसहित गन्धर्वों और दैत्योंपर भी विजय पायी थी, उन्हीं तुम्हारे छोटे भाई अर्जुनका आज मुझे कोई चिह्न नहीं दिखायी देता है’॥ ३० १/२ ॥ ततोऽब्रवीद् धर्मराजं भीमसेनस्तथागतम् ॥ ३१ ॥ नेवाद्राक्षं न चाश्रौषं तव कश्मलमीदृशम् । तब वैसी अवस्थामें पड़े हुए धर्मराज युधिष्ठिरसे भीमसेनने कहा—‘राजन्! आपकी ऐसी घबराहट तो पहले मैंने न कभी देखी थी और न सुनी ही थी ॥ ३१ १/२ ॥ पुरातिदुःखदीर्णानां भवान् गतिरभूद्धि नः ॥ ३२ ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजेन्द्र शाधि किं करवाणि ते । ‘पहले जब कभी हमलोग अत्यन्त दुःखसे अधीर हो उठते थे, तब आप ही हमें सहारा दिया करते थे। राजेन्द्र! उठिये, उठिये, आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ ३२ १/२ ॥ न ह्यसाध्यमकार्यं वा विद्यते मम मानद ॥ ३३ ॥ आज्ञापय कुरुश्रेष्ठ मा च शोके मनः कृथाः । ‘मानद! इस संसारमें ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो मेरे लिये असाध्य हो अथवा जिसे मैं आपकी आज्ञा मिलनेपर न करूँ। कुरुश्रेष्ठ! आज्ञा दीजिये। अपने मनको शोकमें न डालिये’ ॥ ३३ १/२ ॥ तमब्रवीदश्रुपूर्णः कृष्णसर्प इव श्वसन् ॥ ३४ ॥ भीमसेनमिदं वाक्यं म्लानवदनो नृपः । तब राजा युधिष्ठिर म्लानमुख हो काले सर्पके समान लंबी साँसें खींचते हुए नेत्रोंमें आँसू भरकर भीमसेनसे इस प्रकार बोले— ॥ ३४ १/२ ॥ यथा शङ्खस्य निर्घोषः पाञ्चजन्यस्य श्रूयते ॥ ३५ ॥ पूरितो वासुदेवेन संरब्धेन यशस्विना । नूनमद्य हतः शेते तव भ्राता धनंजयः ॥ ३६ ॥ ‘भैया! इस समय पांचजन्य शंखकी जैसी ध्वनि सुनायी देती है और यशस्वी वासुदेवने क्रोधमें भरकर उस शंखको जिस तरह बजाया है, उससे जान पड़ता है, आज तुम्हारा भाई अर्जुन निश्चय ही मारा जाकर रणभूमिमें सो रहा है ॥ ३५-३६ ॥ तस्मिन् विनिहते नूनं युध्यतेऽसौ जनार्दनः । यस्य सत्त्ववतो वीर्यं ह्युपजीवन्ति पाण्डवाः ॥ ३७ ॥ यं भयेष्वभिगच्छन्ति सहस्राक्षमिवामराः । स शूरः सैन्धवप्रेप्सुरन्वयाद् भारतीं चमूम् ॥ ३८ ॥