भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 874

'उसके मारे जानेपर स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही युद्ध कर रहे हैं। जिस शक्तिशाली वीरके पराक्रमका भरोसा करके हम समस्त पाण्डव जी रहे हैं, भयके अवसरोंपर हम उसी प्रकार जिसका आश्रय लेते हैं, जैसे देवता देवराज इन्द्रका, वही शूरवीर अर्जुन सिंधुराज जयद्रथको अपने वशमें करनेके लिये कौरव-सेनामें घुसा है।। ३७-३८।। तस्य वै गमनं विद्मो भीम नावर्तनं पुनः। श्यामो युवा गुडाकेशो दर्शनीयो महारथः॥ ३९॥ 'भीमसेन! हमें उसके जानेका ही पता है, पुनः लौटनेका नहीं। अर्जुनकी अंगकान्ति श्याम है। वह नवयुवक, निद्रापर विजय पानेवाला, देखनेमें सुन्दर और महारथी है।। ३९।। व्यूढोरस्को महाबाहुर्मत्तद्विरदविक्रमः। चकोरनेत्रस्ताम्रास्यो द्विषतां भयवर्धनः॥ ४०॥ 'उसकी छाती चौड़ी और भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं। उसका पराक्रम मतवाले हाथीके समान है, आँखें चकोरके नेत्रोंके समान विशाल हैं और उसके मुख एवं ओष्ठ लाल-लाल हैं। वह शत्रुओंका भय बढ़ाता है।। ४०।। (मम प्रियहितार्थं च शक्रलोकादिहागतः। वृद्धोपसेवी धृतिमान् कृतज्ञः सत्यसङ्गरः॥ प्रविष्टो महतीं सेनामपर्यन्तां धनंजयः। प्रविष्टे च चमूं घोरामर्जुने शत्रुनाशने॥ प्रेषितः सात्वतो वीरः फाल्गुनस्य पदानुगः। तस्याभिगमनं जाने भीम नावर्तनं पुनः॥) 'अर्जुन मेरे प्रिय और हितके लिये इन्द्रलोकसे यहाँ आया है। वह वृद्धजनोंका सेवक, धैर्यवान्, कृतज्ञ तथा सत्यप्रतिज्ञ है। वह धनंजय शत्रुओंकी विशाल एवं अपार सेनामें घुसा है। शत्रुनाशन अर्जुनके उस भयंकर सेनामें प्रवेश करनेपर मैंने सात्वतवीर सात्यकिको उसके चरणोंका अनुगामी बनाकर भेजा है। भीमसेन! सात्यकिके भी मुझे जानेका ही पता है, लौटनेका नहीं। तदिदं मम भद्रं ते शोकस्थानमरिंदम। अर्जुनार्थे महाबाहो सात्वतस्य च कारणात्॥ ४१॥ वर्धते हविषेवाग्निरिध्यमानः पुनः पुनः। तस्य लक्ष्म न पश्यामि तेन विन्दामि कश्मलम्॥ ४२॥ 'शत्रुदमन महाबाहु भीम! तुम्हारा कल्याण हो। यही मेरे शोकका कारण है। अर्जुन और सात्यकिके लिये ही मैं दुःखी हो रहा हूँ। जैसे बारंबार घी डालनेसे आग प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार मेरी शोकाग्नि बढ़ती जाती है। मैं अर्जुनका कोई चिह्न नहीं देखता, इसीसे मुझपर मोह छा रहा है।। ४१-४२।। तं विद्धि पुरुषव्याघ्रं सात्वतं च महारथम्।