महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 875, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंस तं महारथं पश्चादनुयातस्तवानुजम् ॥ ४३ ॥ ‘उन सात्वतवंशी पुरुषसिंह महारथी सात्यकिका भी पता लगाओ। वे तुम्हारे छोटे भाई महारथी अर्जुनके पीछे गये हैं ॥ ४३ ॥ तमपश्यन्महाबाहुमहं विन्दामि कश्मलम् । पार्थे तस्मिन् हते चैव युध्यते नूनमग्रणीः ॥ ४४ ॥ ‘उन महाबाहु सात्यकिको न देखनेके कारण भी मैं भारी घबराहटमें पड़ गया हूँ। पार्थके मारे जानेपर अवश्य ही सात्यकि भी आगे होकर युद्ध कर रहे हैं ॥ ४४ ॥ सहायोनास्य वै कश्चित् तेन विन्दामि कश्मलम् । तस्मिन् कृष्णे हते नूनं युध्यते युद्धकोविदः ॥ ४५ ॥ ‘उनका कोई दूसरा सहायक नहीं है। इससे मुझे बड़ी घबराहट हो रही है। निश्चय ही उनके मारे जानेपर युद्धकलाकोविद भगवान् श्रीकृष्ण युद्ध कर रहे हैं ॥ ४५ ॥ न हि मे शुध्यते भावस्तयोरेव परंतप । स तत्र गच्छ कौन्तेय यत्र यातो धनंजयः ॥ ४६ ॥ सात्यकिश्च महावीर्यः कर्तव्यं यदि मन्यसे । वचनं मम धर्मज्ञ भ्राता ज्येष्ठो भवामि ते ॥ ४७ ॥ न तेऽर्जुनस्तथा ज्ञेयो ज्ञातव्यः सात्यकिर्यथा । चिकीर्षुर्मत्प्रियं पार्थ स यातः सव्यसाचिनः । पदवीं दुर्गमां घोरामगम्यामकृतात्मभिः ॥ ४८ ॥ ‘परंतप! अर्जुन और सात्यकिके जीवनके विषयमें जो मेरे मनमें संशय उत्पन्न हो गया है, वह दूर नहीं हो रहा है। अतः कुन्तीनन्दन! तुम वहीं जाओ, जहाँ अर्जुन और महापराक्रमी सात्यकि गये हैं। धर्मज्ञ! मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ। यदि तुम मेरी आज्ञाका पालन करना उचित मानते हो तो ऐसा ही करो। तुम्हें अर्जुनकी उतनी खोज नहीं करनी है, जितनी सात्यकिकी। पार्थ! सात्यकिने मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे सव्यसाची अर्जुनके उस दुर्गम एवं भयंकर पथका अनुसरण किया है, जो अजितात्मा पुरुषोंके लिये अगम्य है ॥ ४६—४८ ॥ दृष्ट्वा कुशलिनौ कृष्णौ सात्वतं चैव सात्यकिम् । संविदं चैव कुर्यास्त्वं सिंहनादेन पाण्डव ॥ ४९ ॥ ‘पाण्डुनन्दन! जब तुम भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा सात्वतवंशी वीर सात्यकिको सकुशल देखना, तब उच्च स्वरसे सिंहनाद करके मुझे इसकी सूचना दे देना’ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि युधिष्ठिरचिन्तायां षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२६ ॥