महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 949, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
भीमसेन और कर्णका युद्ध तथा दुर्योधनके सात भाइयोंका वध
संजय उवाच
भीमसेनस्य राधेयः श्रुत्वा ज्यातलनिःस्वनम् । नामृष्यत यथा मत्तो गजः प्रतिगजस्वनम् ॥ १ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! भीमसेनके धनुषकी टंकार सुनकर राधानन्दन कर्ण उसे सहन न कर सका। जैसे मतवाला हाथी अपने प्रतिपक्षी गजराजकी गर्जनाको नहीं सहन कर पाता ॥ १ ॥
सोऽपक्रम्य मुहूर्तं तु भीमसेनस्य गोचरात् । पुत्रांस्तव ददर्शाथ भीमसेनेन पातितान् ॥ २ ॥ उसने थोड़ी देरके लिये भीमसेनकी दृष्टिसे दूर हटनेपर देखा कि भीमसेनने आपके पुत्रोंको मार गिराया है ॥ २ ॥
तानवेक्ष्य नरश्रेष्ठ विमना दुःखितस्तदा । निःश्वसन् दीर्घमुष्णं च पुनः पाण्डवमभ्ययात् ॥ ३ ॥ नरश्रेष्ठ! उनकी वह अवस्था देखकर उस समय कर्णको बहुत दुःख हुआ। उसका मन उदास हो गया। वह गरम-गरम लंबी साँस खींचता हुआ पुनः पाण्डुनन्दन भीमसेनके सामने आया ॥ ३ ॥
स ताम्रनयनः क्रोधाच्छ्वसन्निव महोरगः । बभौ कर्णः शरानस्यन् रश्मीनिव दिवाकरः ॥ ४ ॥ उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं और वह फुफकारते हुए महान् सर्पके समान उच्छ्वास खींच रहा था। उस समय बाणोंकी वर्षा करता हुआ कर्ण अपनी किरणोंका प्रसार करते हुए सूर्यदेवके समान शोभा पा रहा था ॥ ४ ॥
किरणैरिव सूर्यस्य महीध्रो भरतर्षभ । कर्णचापच्युतैर्बाणैः प्राच्छाद्यत वृकोदरः ॥ ५ ॥ भरतश्रेष्ठ! जैसे सूर्यकी किरणोंसे पर्वत ढक जाता है, उसी प्रकार कर्णके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा भीमसेन आच्छादित हो गये ॥ ५ ॥
ते कर्णचापप्रभवाः शरा बर्हिणवाससः । विविशुः सर्वतः पार्थं वासायेवाण्डजा द्रुमम् ॥ ६ ॥