महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 950, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर्णके धनुषसे छूटे हुए वे मयूरपंखधारी बाण सब ओरसे आकर भीमसेनके शरीरमें उसी प्रकार घुसने लगे, जैसे पक्षी बसेरा लेनेके लिये वृक्षोंपर आ जाते हैं ।।
कर्णचापच्युता बाणाः सम्पतन्तस्ततस्ततः ।
रुक्मपुङ्खा व्यराजन्त हंसाः श्रेणीकृता इव ।। ७ ।।
कर्णके धनुषसे छूटकर इधर-उधर पड़नेवाले सुवर्णपंखयुक्त बाण श्रेणीबद्ध हंसोंके समान शोभा पा रहे थे ।। ७ ।।
चापध्वजोपस्करेभ्यश्छत्रादीषामुखाद् युगात् ।
प्रभवन्तो व्यदृश्यन्त राजन्नाधिरथेः शराः ।। ८ ।।
राजन्! उस समय अधिरथपुत्र कर्णके बाण केवल धनुषसे ही नहीं, ध्वज आदि अन्य समानोंसे, छत्रसे, ईषादण्ड आदिसे तथा रथके जूएसे भी प्रकट होते दिखायी देते थे ।। ८ ।।
खं पूरयन् महावेगान् खगमान् गृध्रवाससः ।
सुवर्णविकृतांश्चित्रान् मुमोचाधिरथिः शरान् ।। ९ ।।
अधिरथपुत्र कर्णने अन्तरिक्षको व्याप्त करते हुए महान् वेगशाली, आकाशमें विचरनेवाले गृध्रके पंखोंसे युक्त और सुवर्णके बने हुए विचित्र बाण चलाये ।। ९ ।।
तमन्तकमिवायस्तमापतन्तं वृकोदरः ।
त्यक्त्वा प्राणानतिक्रम्य विव्याध निशितैः शरैः ।। १० ।।
कर्णको यमराजके समान आयासयुक्त हो आते देख भीमसेन प्राणोंका मोह छोड़कर पराक्रमपूर्वक उसे पैने बाणोंद्वारा बींधने लगे ।। १० ।।
तस्य वेगमसह्यं स दृष्ट्वा कर्णस्य पाण्डवः ।
महत्तश्च शरौघांस्तान् न्यवारयत वीर्यवान् ।। ११ ।।
पराक्रमी पाण्डुपुत्र भीमने कर्णके वेगको असह्य देखकर उसके महान् बाणसमूहोंका निवारण किया ।। ११ ।।
ततो विधम्याधिरथेः शरजालानि पाण्डवः ।
विव्याध कर्णं विंशत्या पुनरन्यैः शिलाशितैः ।। १२ ।।
पाण्डुकुमार भीमने अधिरथपुत्रके शरसमूहोंका निवारण करके शिलापर चढ़ाकर तेज किये हुए बीस अन्य बाणोंद्वारा कर्णको घायल कर दिया ।। १२ ।।
यथैव हि स कर्णेन पार्थः प्रच्छादितः शरैः ।
तथैव स रणे कर्णं छादयामास पाण्डवः ।। १३ ।।
जैसे कर्णने अपने बाणोंद्वारा भीमसेनको आच्छादित किया था, उसी प्रकार पाण्डुपुत्र भीमने भी कर्णको ढक दिया ।। १३ ।।
दृष्ट्वा तु भीमसेनस्य विक्रमं युधि भारत ।
अभ्यनन्दंस्त्वदीयाश्च सम्प्रहृष्टाश्च चारणाः ।। १४ ।।