महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 968, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर क्रोधमें भरे हुए सुदृढ़ पराक्रमी महाबाहु भीमसेनने अपने अस्त्रोंद्वारा कर्णके अस्त्रोंका निवारण करके उसे बाणोंसे बींध डाला ।। ५६ ।। कर्णोऽपि भीमसेनस्य निवार्येषून् महाबलः । प्राहिणोन्नव नाराचानाशीविषसमान् रणे ।। ५७ ।। महाबली कर्णने भी रणक्षेत्रमें भीमसेनके बाणोंका निवारण करके उनके ऊपर विषैले सर्पोंके समान नौ नाराच चलाये ।। ५७ ।। तावद्विरथ तान् भीमो व्योम्नि चिच्छेद पत्रिभिः । नाराचान् सूतपुत्रस्य तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।। ५८ ।। भीमसेनने उतने ही बाणोंसे आकाशमें सूतपुत्रके सारे नाराच काट डाले और उससे कहा 'खड़ा रह, खड़ा रह' ।। ततो भीमो महाबाहुः शरं क्रुद्धान्तकोपमम् । मुमोचाधिरथेर्वीरो यमदण्डमिवापरम् ।। ५९ ।। तत्पश्चात् महाबाहु वीर भीमसेनने कर्णके ऊपर ऐसा बाण चलाया, जो क्रुद्ध यमराजके समान तथा दूसरे यमदण्डके सदृश भयंकर था ।। ५९ ।। तमापतन्तं चिच्छेद राधेयः प्रहसन्निव । त्रिभिः शरैः शरं राजन् पाण्डवस्य प्रतापवान् ।। ६० ।। राजन्! अपने ऊपर आते हुए भीमसेनके उस बाणको प्रतापी राधानन्दन कर्णने तीन बाणोंद्वारा हँसते हुए-से काट डाला ।। ६० ।। पुनश्चासृजदुग्राणि शरवर्षाणि पाण्डवः । तस्य तान्याददे कर्णः सर्वाण्यस्त्राण्यभीतवत् ।। ६१ ।। तब पाण्डुनन्दन भीमने पुनः भयानक बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी; परंतु कर्णने उन सब अस्त्रोंको निर्भयतापूर्वक आत्मसात् कर लिया ।। ६१ ।। युध्यमानस्य भीमस्य सूतपुत्रोऽस्त्रमायया । तस्येषुधी धनुर्ज्यां च बाणैः संनतपर्वभिः ।। ६२ ।। रश्मीन् योक्त्राणि चाश्वानां क्रुद्धः कर्णोऽच्छिनन्मृधे । तस्याश्वांश्च पुनहर्त्वा सूतं विव्याध पञ्चभिः ।। ६३ ।। क्रोधमें भरे हुए सूतपुत्र कर्णने अपने अस्त्रोंकी मायासे तथा झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा युद्धपरायण भीमसेनके दो तरकसों, धनुषकी प्रत्यंचा, बागडोर तथा घोड़े जोतनेकी रस्सियोंको भी युद्धस्थलमें काट डाला। फिर घोड़ोंको भी मारकर सारथिको पाँच बाणोंसे घायल कर दिया ।। ६२-६३ ।। सोऽपसृत्य द्रुतं सूतो युधामन्यो रथं ययौ । विहसन्निव भीमस्य क्रुद्धः कालानलद्युतिः ।। ६४ ।। ध्वजं चिच्छेद राधेयः पताकां च व्यपातयत् ।