भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 969, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 969

सारथि वहाँसे भागकर तुरंत ही युधामन्युके रथपर चढ़ गया। इधर क्रोधमें भरे हुए कालाग्निके समान तेजस्वी राधापुत्र कर्णने भीमसेनका उपहास-सा करते हुए उनकी ध्वजा और पताकाको भी काट गिराया ।।

स विधन्वा महाबाहुरथ शक्तिं परामृशत् ।। ६५ ।। तां व्यवासृजदाविध्य क्रुद्धः कर्णरथं प्रति । धनुष कट जानेपर कुपित हुए महाबाहु भीमसेनने शक्ति हाथमें ली और उसे घुमाकर कर्णके रथपर दे मारा ।। ६५ १/२ ।।

तामाधिरथिरायस्तः शक्तिं काञ्चनभूषणाम् ।। ६६ ।। आपतन्तीं महोल्काभां चिच्छेद दशभिः शरैः । कर्ण कुछ थक-सा गया था, तो भी उसने बहुत बड़ी उल्काके समान अपनी ओर आती हुई उस सुवर्णभूषित शक्तिको दस बाणोंसे काट दिया ।। ६६ १/२ ।।

सापतद् दशधा छिन्ना कर्णस्य निशितैः शरैः ।। ६७ ।। अस्यतः सूतपुत्रस्य मित्रार्थे चित्रयोधिनः । मित्रके हितके लिये विचित्र युद्ध करनेवाले तथा बाणप्रहारमें तत्पर सूतपुत्र कर्णके तीखे बाणोंसे दस टुकड़ोंमें कटकर वह शक्ति धरतीपर गिर पड़ी ।। ६७ १/२ ।।

स चर्मादत्त कौन्तेयो जातरूपपरिष्कृतम् ।। ६८ ।। खड्गं चान्यतरप्रेप्सुर्मृत्योरग्रे जयस्य वा । तब कुन्तीकुमार भीमसेनने युद्धमें सम्मुख मृत्यु अथवा विजय इन दोनोंमें से एकका निश्चितरूपसे वरण करनेकी इच्छा रखकर ढाल और सुवर्णभूषित तलवार हाथमें ले ली ।। ६८ १/२ ।।

तदस्य तरसा क्रुद्धो व्यधमच्चर्म सुप्रभम् ।। ६९ ।। शरैर्बहुभिरत्युग्रैः प्रहसन्निव भारत । भारत! उस समय क्रोधमें भरे हुए कर्णने हँसते हुए-से वेगपूर्वक बहुत-से अत्यन्त भयंकर बाण मारकर भीमसेनकी चमकीली ढाल नष्ट कर दी ।। ६९ १/२ ।।

स विचर्मा महाराज विरथः क्रोधमूर्च्छितः ।। ७० ।। असिं प्रासृजदाविध्य त्वरन् कर्णरथं प्रति । महाराज! ढाल और रथसे रहित हुए भीमसेनने क्रोधसे आतुर हो बड़ी उतावलीके साथ कर्णके रथपर तलवार घुमाकर चला दी ।। ७० १/२ ।।

स धनुः सूतपुत्रस्य सज्यं छित्त्वा महानसिः ।। ७१ ।। पपात भुवि राजेन्द्र क्रुद्धः सर्प इवाम्बरात् । राजेन्द्र! वह बड़ी तलवार आकाशसे कुपित सर्पकी भाँति आकर सूतपुत्र कर्णके प्रत्यंचासहित धनुषको काटती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी ।। ७१ १/२ ।।