भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 976, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 976

योद्धव्यं मारिषाण्यत्र न योद्धव्यं च मादृशैः । मादृशैर्युध्यमानानामेतच्चान्यच्च विद्यते ॥ १०४ ॥ 'आर्य! तुझे और लोगोंके साथ युद्ध करना चाहिये। मेरे-जैसे वीरोंके साथ नहीं। मेरे-जैसे योद्धाओंसे जूझनेवालोंकी ऐसी ही अथवा इससे भी बुरी दशा होती है ॥ १०४ ॥ गच्छ वा यत्र तौ कृष्णौ तौ त्वां रक्षिष्यतो रणे । गृहं वा गच्छ कौन्तेय किं ते युद्धेन बालक ॥ १०५ ॥ 'अथवा जहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं, वहीं चला जा। वे रणभूमिमें तेरी रक्षा करेंगे अथवा कुन्तीकुमार! तू घर चला जा। बच्चे! तुझे युद्धसे क्या लाभ है?' ॥ १०५ ॥ कर्णस्य वचनं श्रुत्वा भीमसेनोऽतिदारुणम् । उवाच कर्णं प्रहसन् सर्वेषां शृण्वतां वचः ॥ १०६ ॥ कर्णके ये अत्यन्त कठोर वचन सुनकर भीमसेन ठठाकर हँस पड़े और सबके सुनते हुए उससे इस प्रकार बोले— ॥ १०६ ॥ जितस्त्वमसकृद् दुष्ट कत्थसे किं वृथाऽऽत्मना । जयाजयौ महेन्द्रस्य लोके दृष्टौ पुरातनैः ॥ १०७ ॥ 'अरे दुष्ट! मैंने तुझे एक बार नहीं, बारंबार हराया है; फिर क्यों व्यर्थ अपने ही मुँहसे अपनी बड़ाई कर रहा है। संसारमें पूर्वपुरुषोंने देवराज इन्द्रकी भी कभी जय और कभी पराजय होती देखी है ॥ १०७ ॥ मल्लयुद्धं मया सार्धं कुरु दुष्कुलसम्भव । महाबलो महाभोगी कीचको निहतो यथा ॥ १०८ ॥ तथा त्वां घातयिष्यामि पश्यत्सु सर्वराजसु । 'नीच कुलमें पैदा हुए कर्ण! आ, मेरे साथ मल्ल-युद्ध कर ले। जैसे मैंने महान् बलशाली महाभोगी कीचकको पीस डाला था, उसी प्रकार इन समस्त राजाओंके देखते-देखते मैं तुझे अभी मौतके हवाले कर दूँगा' ॥ १०८ १/२ ॥ भीमस्य मतमाज्ञाय कर्णो बुद्धिमतां वरः ॥ १०९ ॥ विरराम रणात् तस्मात् पश्यतां सर्वधन्विनाम् । भीमसेनका यह अभिप्राय जानकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कर्ण समस्त धनुर्धरोंके सामने ही उस युद्धसे हट गया ॥ १०९ १/२ ॥ एवं तं विरथं कृत्वा कर्णो राजन् व्यकत्थयत् ॥ ११० ॥ प्रमुखे वृष्णिसिंहस्य पार्थस्य च महात्मनः । ततो राजन् शिलाधौतान् शरान् शाखामृगध्वजः ॥ १११ ॥ प्राहिणोत् सूतपुत्राय केशवेन प्रचोदितः ।

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