महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजन्! इस प्रकार कर्णने भीमसेनको रथहीन करके जब वृष्णिवंशके सिंह भगवान् श्रीकृष्ण और महामना अर्जुनके सामने ही अपनी इतनी प्रशंसा की, तब श्रीकृष्णकी प्रेरणासे कपिध्वज अर्जुनने शिलापर स्वच्छ किये हुए बहुत-से बाणोंको सूतपुत्र कर्णपर चलाया ।। ११०-१११ १/२ ।।
ततः पार्थभुजोत्सृष्टाः शराः कनकभूषणाः ।। ११२ ।। गाण्डीवप्रभवाः कर्णं हंसाः क्रौञ्चमिवाविशन् । तत्पश्चात् अर्जुनकी भुजाओंसे छोड़े गये तथा गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए वे सुवर्णभूषित बाण कर्णके शरीरमें उसी प्रकार घुस गये, जैसे हंस क्रौंच पर्वतकी गुफाओंमें समा जाते हैं ।। ११२ १/२ ।।
स भुजङ्गैरिवाविष्टैर्गाण्डीवप्रेषितैः शरैः ।। ११३ ।। भीमसेनादपासेधत् सूतपुत्रं धनंजयः । इस प्रकार धनंजयने गाण्डीव धनुषसे छोड़े गये रोषभरे सर्पोंके समान बाणोंद्वारा सूतपुत्र कर्णको भीमसेनसे दूर हटा दिया ।। ११३ १/२ ।।
स च्छिन्नधन्वा भीमेन धनंजयशराहतः ।। ११४ ।। कर्णो भीमादपायासीद् रथेन महता द्रुतम् । भीमसेनने कर्णके धनुषको तो पहलेसे ही तोड़ दिया था। इसलिये वह धनंजयके बाणोंसे घायल हो भीमसेनको छोड़कर अपने विशाल रथके द्वारा तुरंत ही वहाँसे दूर हट गया ।। ११४ १/२ ।।
भीमोऽपि सात्यकेर्वाहं समारुह्य नरर्षभः ।। ११५ ।। अन्वयाद् भ्रातरं संख्ये पाण्डवं सव्यसाचिनम् । इधर नरश्रेष्ठ भीमसेन भी सात्यकिके रथपर आरूढ़ हो युद्धस्थलमें सव्यसाची पाण्डुपुत्र भाई अर्जुनके पास जा पहुँचे ।। ११५ १/२ ।।
ततः कर्णं समुद्दिश्य त्वरमाणो धनंजयः ।। ११६ ।। नाराचं क्रोधताम्राक्षः प्रैषीन्मृत्युमिवान्तकः । तत्पश्चात् क्रोधसे लाल आँखें किये अर्जुनने बड़ी उतावलीके साथ कर्णको लक्ष्य करके एक नाराच चलाया, मानो यमराजने किसीके लिये मौत भेज दी हो ।। ११६ १/२ ।।
स गरुत्मानिवाकाशे प्रार्थयन् भुजगोत्तमम् ।। ११७ ।। नाराचोऽभ्यपतत् कर्णं तूर्णं गाण्डीवचोदितः । गाण्डीव धनुषसे छूटा हुआ वह नाराच आकाशमार्गसे तुरंत ही कर्णकी ओर चला, मानो गरुड़ किसी उत्तम सर्पको पकड़नेके लिये जा रहे हों ।। ११७ १/२ ।।
तमन्तरिक्षे नाराचं द्रौणिश्चिच्छेद पत्रिणा ।। ११८ ।। धनंजयभयात् कर्णमुज्जिहीर्षन् महारथः ।