महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 978, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय अर्जुनके भयसे कर्णका उद्धार करनेकी इच्छा रखकर महारथी अश्वत्थामाने अपने बाणसे उस नाराचको आकाशमें ही काट दिया ।। ११८ १/२ ।।
ततो द्रौणिं चतुःषष्ट्या विव्याध कुपितोऽर्जुनः ।। ११९ ।।
शिलीमुखैर्महाराज मा गास्तिष्ठेति चाब्रवीत् ।
महाराज! तब क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने अश्वत्थामाको चौंसठ बाण मारे और कहा—'खड़े रहो, भागना मत' ।। ११९ १/२ ।।
स तु मत्तगजाकीर्णमनीकं रथसंकुलम् ।। १२० ।।
तूर्णमभ्याविशद् द्रौणिर्धनंजयशरार्दितः ।
परंतु अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित हो अश्वत्थामा तुरंत ही रथसे व्याप्त एवं मतवाले हाथियोंसे भरे हुए व्यूहके भीतर घुस गया ।। १२० १/२ ।।
ततः सुवर्णपृष्ठानां चापानां कूजतां रणे ।। १२१ ।।
शब्दं गाण्डीवघोषेण कौन्तेयोऽभ्यभवद् बली ।
तब बलवान् कुन्तीकुमार अर्जुनने रणक्षेत्रमें टंकार करते हुए सुवर्णमय पृष्ठभागवाले समस्त धनुषोंके सम्मिलित शब्दोंको अपने गाण्डीव धनुषके गम्भीर घोषसे दबा दिया ।। १२१ १/२ ।।
धनंजयस्तथा यान्तं पृष्ठतो द्रौणिमभ्यगात् ।। १२२ ।।
नातिदीर्घमिवाध्वानं शरैः संत्रासयन् बलम् ।
अर्जुन भागते हुए अश्वत्थामाके पीछे-पीछे अपने बाणोंद्वारा कौरव-सेनाको संत्रस्त करते हुए कुछ दूरतक गये ।। १२२ १/२ ।।
विदार्य देहान् नाराचैर्नरवारणवाजिनाम् ।। १२३ ।।
कङ्कबर्हिणवासोभिर्बलं व्यधमदर्जुनः ।
उस समय उन्होंने कंक और मोरकी पाँखोंसे युक्त नाराचोंद्वारा घोड़ों, हाथियों और मनुष्योंके शरीरोंको विदीर्ण करके सारी सेनाको तहस-नहस कर दिया ।।
तद् बलं भरतश्रेष्ठ सवाजिद्विपमानवम् ।। १२४ ।।
पाकशासनिरायत्तः पार्थः स निजघान ह ।। १२५ ।।
भरतश्रेष्ठ! उस समय सावधान हुए इन्द्रकुमार कुन्तीपुत्र अर्जुनने हाथी, घोड़ों और मनुष्योंसे भरी हुई उस सेनाका संहार कर डाला ।। १२४-१२५ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भीमकर्णयुद्धे
एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भीमसेन और कर्णका युद्धविषयक एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३९ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल १२५ १/२ श्लोक हैं।)