भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1009

खेद और शिथिलताको कभी अपने मनमें स्थान नहीं देना चाहिये। खेद होनेपर कहाँसे सुख प्राप्त हो सकता है। प्रयत्नसे ही अभिलषित अर्थकी प्राप्ति होती है; अतः तुमलोग इस बालककी रक्षाका प्रयत्न छोड़कर निर्दयतापूर्वक कहाँ चले जा रहे हो? ।। ५१ ।। आत्ममांसोपवृत्तं च शरीरार्धमयीं तनुम् । पितॄणां वंशकर्तारं वने त्यक्त्वा क्व यास्यथ ।। ५२ ।। यह बालक तुम्हारे अपने ही रक्त-मांसका बना हुआ है, आधे शरीरके समान है और पितरोंके वंशकी वृद्धि करनेवाला है, इसे वनमें छोड़कर तुम कहाँ जाओगे? ।। ५२ ।। अथवास्तंगते सूर्ये संध्याकाल उपस्थिते । ततो नेष्यथ वा पुत्रमिहस्था वा भविष्यथ ।। ५३ ।। अच्छा, इतना ही करो कि जबतक सूर्य अस्त न हो और संध्याकाल उपस्थित न हो जाय, तबतक यहाँ रुके रहो; फिर अपने इस पुत्रको साथ ले जाना अथवा यहीं बैठे रहना ।। ५३ ।।

गृध्र उवाच

अद्य वर्षसहस्रं मे साग्रं जातस्य मानुषाः । न च पश्यामि जीवन्तं मृतं स्त्रीपुंनपुंसकम् ।। ५४ ।। **गीधने कहा—**मनुष्यो! मुझे जन्म लिये आज एक हजार वर्षसे अधिक हो गये; परंतु मैंने कभी किसी स्त्री-पुरुष या नपुंसकको मरनेके बाद फिर जीवित होते नहीं देखा ।। ५४ ।। मृता गर्भेपु जायन्ते जातमात्रा म्रियन्ति च । चङ्क्रमन्तो म्रियन्ते च यौवनस्थास्तथा परे ।। ५५ ।। कुछ लोग गर्भोंमें ही मरकर जन्म लेते हैं, कुछ जन्म लेते ही मर जाते हैं, कुछ चलने-फिरने लायक होकर मरते हैं और कुछ लोग भरी जवानीमें ही चल बसते हैं ।। ५५ ।। अनित्यानीह भाग्यानि चतुष्पात्पक्षिणामपि । जङ्गमानां नगानां वाप्यायुरग्रेऽवतिष्ठते ।। ५६ ।। इस संसारमें पशुओं और पक्षियोंके भी भाग्यफल अनित्य हैं। स्थावरों और जंगमोंके जीवन में भी आयुकी ही प्रधानता है ।। ५६ ।। इष्टदारवियुक्ताश्च पुत्रशोकान्वितास्तथा । दह्यमानाः स्म शोकेन गृहं गच्छन्ति नित्यशः ।। ५७ ।। प्रिय पत्नीके वियोग और पुत्रशोकसे संतप्त हो कितने ही प्राणी प्रतिदिन शोककी आगमें जलते हुए इस मरघटसे अपने घरको लौटते हैं ।। ५७ ।। अनिष्टानां सहस्राणि तथेष्टानां शतानि च । उत्सृज्येह प्रयाता वै बान्धवा भृशदुःखिताः ।। ५८ ।।