भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1010, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1010

कितने ही भाई-बन्धु अत्यन्त दुखी हो यहाँ हजारों अप्रिय त था सैकड़ों प्रिय व्यक्तियोंको छोड़कर चले गये हैं॥ ५८॥

त्यज्यतामेष निस्तेजाः शून्यः काष्ठत्वमागतः ।
अन्यदेहविषक्तं हि शावं काष्ठत्वमागतम् ॥ ५९ ॥
त्यक्तजीवस्य चैवास्य कस्माद्धित्वा न गच्छत ।
निरर्थको ह्ययं स्नेहो निष्फलश्च परिश्रमः ॥ ६० ॥
यह मृत बालक तेजोहीन होकर थोथे काठके समान हो गया है। इसे छोड़ दो। इसका जीव दूसरे शरीरमें आसक्त है। इस निष्प्राण बालकका यह शव काठके समान हो गया है तुमलोग इसे छोड़कर चले क्यों नहीं जाते? तुम्हारा यह स्नेह निरर्थक है और इस परिश्रमका भी कोई फल नहीं है॥ ५९-६०॥

चक्षुर्भ्यां न च कर्णाभ्यां संशृणोति समीक्षते ।
कस्मादेनं समुत्सृज्य न गृहान् गच्छताशु वै ॥ ६१ ॥
यह न तो आँखोंसे देखता है और न कानोंसे कुछ सुनता ही है। फिर इसे त्यागकर तुमलोग जल्दी अपने घर क्यों नहीं चले जाते ॥ ६१ ॥

मोक्षधर्माश्रितैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिः सुनिष्ठुरैः ।
मयोक्ता गच्छत क्षिप्रं स्वं स्वमेव निवेशनम् ॥ ६२ ॥
मेरी ये बातें बड़ी निष्ठुर जान पड़ती हैं; परंतु हेतुगर्भित और मोक्ष-धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं; अतः इन्हें मानकर मेरे कहनेसे तुमलोग शीघ्र अपने-अपने घर पधारो ॥ ६२ ॥

प्रज्ञाविज्ञानयुक्तेन बुद्धिसंज्ञाप्रदायिना ।
वचनं श्राविता नूनं मानुषाः संनिवर्तत ।
शोको द्विगुणतां याति दृष्ट्वा स्मृत्वा च चेष्टितम् ॥ ६३ ॥
मनुष्यो! मैं बुद्धि और विज्ञानसे युक्त तथा दूसरोंको भी ज्ञान प्रदान करनेवाला हूँ। मैंने तुम्हें विवेक उत्पन्न करनेवाली बहुत-सी बातें सुनायी हैं। अब तुमलोग लौट जाओ। अपने मरे हुए स्वजनका शव देखकर तथा उसकी चेष्टाओंको स्मरण करके दूना शोक होता है॥ ६३॥

इत्येतद् वचनं श्रुत्वा संनिवृत्तास्तु मानुषाः ।
अपश्यत् तं तदा सुप्तं द्रुतमागत्य जम्बुकः ॥ ६४ ॥
गीधकी यह बात सुनकर वे सब मनुष्य घरकी ओर लौट पड़े। तब सियारने तुरंत आकर उस सोते हुए बालकको देखा ॥ ६४ ॥

जम्बुक उवाच

इमं कनकवर्णाभं भूषणैः समलंकृतम् ।

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