भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1014

इस संसारमें सब कुछ असत्य एवं बहुत अरुचिकर है। यहाँ अनाप-शनाप बकनेवाले तो बहुत हैं, परंतु प्रिय वचन बोलनेवाले विरले ही हैं। यहाँ का भाव दुःख और शोककी वृद्धि करनेवाला है। इसे देखकर मुझे यह मनुष्यलोक दो घड़ी भी अच्छा नहीं लगता ।। ८५ १/२ ।।

अहो धिगृ गृध्रवाक्येन यथैवाबुद्धयस्तथा ।। ८६ ।।
कथं गच्छत निःस्नेहाः सुतस्नेहं विसृज्य च ।
अहो! धिक्कार है। तुमलोग गीधकी बातोंमें आकर मूर्खोंके समान पुत्रस्नेहसे रहित हुए प्रेमशून्य होकर कैसे घरको लौटे जा रहे हो? ।। ८६ १/२ ।।

प्रदीप्ताः पुत्रशोकेन संनिवर्तत मानुषाः ।। ८७ ।।
श्रुत्वा गृध्रस्य वचनं पापस्येहाकृतात्मनः ।
मनुष्यो! यह गीध तो बड़ा पापी और अपवित्र हृदयवाला है। इसकी बात सुनकर तुमलोग पुत्रशोकसे जलते हुए भी क्यों लौटे जा रहे हो? ।। ८७ १/२ ।।

सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ।। ८८ ।।
सुखदुःखावृते लोके नेहास्त्येकमनन्तरम् ।
सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आता है। सुख और दुःखसे घिरे हुए इस जगत्में निरन्तर (सुख या दुःख) अकेला नहीं बना रहता है ।। ८८ १/२ ।।

इमं क्षितितले त्यक्त्वा बालं रूपसमन्वितम् ।। ८९ ।।
कुलशोभाकरं मूढाः पुत्रं त्यक्त्वा क्व यास्यथ ।
रूपयौवनसम्पन्नं द्योतमानमिव श्रिया ।। ९० ।।
यह सुन्दर बालक तुम्हारे कुलकी शोभा बढ़ानेवाला है। यह रूप और यौवनसे सम्पन्न है तथा अपनी कान्तिसे प्रकाशित हो रहा है। मूर्खों! इस पुत्रको पृथ्वीपर डालकर तुम कहाँ जाओगे? ।। ८९-९० ।।

जीवन्तमेव पश्यामि मनसा नात्र संशयः ।
विनाशो नास्य न हि वै सुखं प्राप्स्यथ मानुषाः ।। ९१ ।।
मनुष्यो! मैं तो अपने मनसे इस बालकको जीवित ही देख रहा हूँ, इसमें संशय नहीं है। इसका नाश नहीं होगा, तुम्हें अवश्य ही सुख मिलेगा ।। ९१ ।।

पुत्रशोकाभितप्तानां मृतानामद्य वः क्षमम् ।
सुखसम्भावनं कृत्वा धारयित्वा सुखं स्वयं ।
त्यक्त्वा गमिष्यथ क्वाद्य समुत्सृज्याल्पबुद्धिवत् ।। ९२ ।।
पुत्रशोकसे संतप्त होकर तुमलोग स्वयं ही मृतक-तुल्य हो रहे हो; अतः तुम्हारे लिये इस तरह लौट जाना उचित नहीं है। इस बालकसे सुखकी सम्भावना करके सुख पानेकी सुदृढ़ आशा धारण कर तुम सब लोग अल्पबुद्धि मनुष्यके समान स्वयं ही इसे त्यागकर अब कहाँ जाओगे? ।। ९२ ।।