महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1015, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंभीष्म उवाच
तथा धर्मविरोधेन प्रियमिथ्याभिधायिना । श्मशानवासिना नित्यं रात्रिं मृगयता नृप ॥ ९३ ॥ ततो मध्यस्थतां नीता वचनैरमृतोपमैः । जम्बुकेन स्वकार्यार्थं बान्धवास्तस्य धिष्ठिताः ॥ ९४ ॥ भीष्मजीने कहा—राजन्! वह सियार सदा श्मशान भूमिमें ही निवास करता था और अपना काम बनानेके लिये रात्रिकालकी प्रतीक्षा कर रहा था; अतः उसने धर्मविरोधी, मिथ्या तथा अमृततुल्य वचन कहकर उस बालकके बन्धु-बान्धवोंको बीचमें ही अटका दिया। वे न जा पाते थे और न रह पाते थे, अन्तमें उन्हें ठहर जाना पड़ा ॥ ९३-९४ ॥
गृध्र उवाच
अयं प्रेतसमाकीर्णो यक्षराक्षससेवितः । दारुणः काननोद्देशः कौशिकैरभिनादितः ॥ ९५ ॥ तब गीधने कहा—मनुष्यो! यह वन्य प्रदेश प्रेतोंसे भरा हुआ है। इसमें बहुत-से यक्ष और राक्षस निवास करते हैं तथा कितने ही उल्लू हू-हू की आवाज कर रहे हैं; अतः यह स्थान बड़ा भयंकर है ॥ ९५ ॥ भीमः सुघोरश्च तथा नीलमेघसमप्रभः । अस्मिन् शवं परित्यज्य प्रेतकार्याण्युपासत ॥ ९६ ॥ यह अत्यन्त घोर, भयानक तथा नीलमेघके समान काला अन्धकारपूर्ण है। इस मुर्देको यहीं छोड़कर तुमलोग प्रेतकर्म करो ॥ ९६ ॥ भानुर्यावत् प्रयात्यस्तं यावच्च विमला दिशः । तावदेनं परित्यज्य प्रेतकार्याण्युपासत ॥ ९७ ॥ जबतक सूर्य डूब नहीं जाते हैं और जबतक दिशाएँ निर्मल हैं, तभीतक इसे यहाँ छोड़कर तुमलोग इसके प्रेतकार्यमें लग जाओ ॥ ९७ ॥ नदन्ति परुषं श्येनाः शिवाः क्रोशन्ति दारुणम् । मृगेन्द्राः प्रतिनन्दन्ति रविरस्तं च गच्छति ॥ ९८ ॥ इस वनमें बाज अपनी कठोर बोली बोलते हैं, सियार भयंकर आवाजमें हुआँ-हुआँ कर रहे हैं, सिंह दहाड़ रहे हैं और सूर्य अस्ताचलको जा रहे हैं ॥ ९८ ॥ चिताधूमेन नीलेन संरज्यन्ते च पादपाः । श्मशाने च निराहाराः प्रतिनर्दन्ति देहिनः ॥ ९९ ॥ चिताके काले धुएँसे यहाँके सारे वृक्ष उसी रंगमें रंग गये हैं। श्मशानभूमिमें यहाँके निराहार प्राणी (प्रेत-पिशाच आदि) गरज रहे हैं ॥ ९९ ॥ सर्वे विकृतदेहाश्चाप्यस्मिन् देशे सुदारुणे ।