भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1016

युष्मान् प्रधर्षयिष्यन्ति विकृता मांसभोजिनः ॥ १०० ॥ इस भयंकर प्रदेशमें रहनेवाले सभी प्राणी विकराल शरीरके हैं। ये सबके सब मांस खानेवाले और विकृत अंगवाले हैं। वे तुमलोगोंको धर दबायेंगे ॥ १०० ॥ क्रूरश्वायं वनोद्देशो भयमद्य भविष्यति । त्यज्यतां काष्ठभूतोऽयं मृष्यतां जाम्बुकं वचः ॥ १०१ ॥ जंगलका यह भाग क्रूर प्राणियोंसे भरा हुआ है। अब तुम्हें यहाँ बहुत बड़े भयका सामना करना पड़ेगा। यह बालक तो अब काठके समान निष्प्राण हो गया है। इसे छोड़ो और सियारकी बातोंके लोभमें न पड़ो ॥ १०१ ॥ यदि जम्बुकवाक्यानि निष्फलान्यनृतानि च । श्रोष्यथ भ्रष्टविज्ञानास्ततः सर्वे विनङ्क्ष्यथ ॥ १०२ ॥ यदि तुमलोग विवेकभ्रष्ट होकर सियारकी झूठी और निष्फल बातें सुनते रहोगे तो सबके सब नष्ट हो जाओगे ॥ १०२ ॥

जम्बुक उवाच स्थीयतां नेह भेतव्यं यावत् तपति भास्करः । तावदस्मिन् सुते स्नेहादनिर्वेदेन वर्तत ॥ १०३ ॥ स्वैरं रुदन्तो विश्रब्धाश्चिरं स्नेहेन पश्यत । (दारुणेऽस्मिन् वनोद्देशे भयं वो न भविष्यति । अयं सौम्यो वनोद्देशः पितॄणां निधनाकरः ॥) स्थीयतां यावदादित्यः किं च क्रव्यादाभाषितैः ॥ १०४ ॥ **सियार बोला—**ठहरो, ठहरो। जबतक यहाँ सूर्यका प्रकाश है, तबतक तुम्हें बिल्कुल नहीं डरना चाहिये। उस समयतक इस बालकपर स्नेह करके इसके प्रति ममतापूर्ण बर्ताव करो। निर्भय होकर दीर्घकालतक इसे स्नेहदृष्टिसे देखो और जी भरकर रो लो। यद्यपि यह वन्यप्रदेश भयंकर है तो भी यहाँ तुम्हें कोई भय नहीं होगा; क्योंकि यह भू-भाग पितरोंका निवास-स्थान होनेके कारण श्मशान होता हुआ भी सौम्य है। जबतक सूर्य दिखायी देते हैं, तबतक यहीं ठहरो। इस मांसभक्षी गीधके कहनेसे क्या होगा? ॥ यदि गृध्रस्य वाक्यानि तीव्राणि रभसानि च । गृह्णीत मोहितात्मानः सुतो वो न भविष्यति ॥ १०५ ॥ यदि तुम मोहितचित्त होकर इस गीधकी घोर एवं घबराहटमें डालनेवाली बातोंमें आ जाओगे तो इस बालकसे हाथ धो बैठोगे ॥ १०५ ॥

भीष्म उवाच गृध्रोऽस्तमित्याह गतो गतो नेति च जम्बुकः । मृतस्य तं परिजनमूचतुस्तौ क्षुधान्वितौ ॥ १०६ ॥