भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1017

भीष्मजी कहते हैं— राजन्! वे गीध और गीदड़ दोनों ही भूखे थे और अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये मृतकके बन्धु-बान्धवोंसे बातें करते थे। गीध कहता था कि सूर्य अस्त हो गये और सियार कहता था नहीं ।।

स्वकार्यबद्धकक्षौ तौ राजन् गृध्रोऽथ जम्बुकः ।
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ शास्त्रमालम्ब्य जल्पतः ।। १०७ ।।
राजन्! गीध और गीदड़ अपना-अपना काम बनानेके लिये कमर कसे हुए थे। दोनोंको ही भूख और प्यास सता रही थी और दोनों ही शास्त्रका आधार लेकर बात करते थे ।। १०७ ।।

तयोर्विज्ञानविदुषोर्द्वयोर्मृगपतत्रिणोः ।
वाक्यैरमृतकल्पैस्तैः प्रतिष्ठन्ति व्रजन्ति च ।। १०८ ।।
उनमेंसे एक पशु था और दूसरा पक्षी। दोनों ही ज्ञानकी बातें जानते थे। उन दोनोंके अमृतरूपी वचनोंसे प्रभावित हो वे मृतकके सम्बन्धी कभी ठहर जाते और कभी आगे बढ़ते थे ।। १०८ ।।

शोकदैन्यसमाविष्टा रुदन्तस्तस्थिरे तदा ।
स्वकार्यकुशलाभ्यां ते सम्भ्राम्यन्ते ह नैपुणात् ।। १०९ ।।
शोक और दीनतासे आविष्ट होकर वे उस समय रोते हुए वहाँ खड़े ही रह गये। अपना-अपना कार्य सिद्ध करनेमें कुशल गीध और गीदड़ने चालाकीसे उन्हें चक्करमें डाल रक्खा था ।। १०९ ।।

तथा तयोर्विवदतोर्विज्ञानविदुषोर्द्वयोः ।
बान्धवानां स्थितानां चाप्युपातिष्ठत शङ्करः ।। ११० ।।
देव्या प्रणोदितो देवः कारुण्यार्दीकृतेक्षणः ।
ततस्तानाह मनुजान् वरदोऽस्मीति शङ्करः ।। १११ ।।
ज्ञान-विज्ञानकी बातें जाननेवाले उन दोनों जन्तुओंमें इस प्रकार वाद-विवाद चल रहा था और मृतकके भाई-बन्धु वहीं खड़े थे। इतनेहीमें भगवती श्रीपार्वतीदेवीकी प्रेरणासे भगवान् शंकर उनके सामने प्रकट हो गये। उस समय उनके नेत्र करुणारससे आर्द्र हो रहे थे। वरदायक भगवान् शिवने उन मनुष्योंसे कहा—'मैं तुम्हें वर दे रहा हूँ' ।। ११०-१११ ।।

ते प्रत्यूचुरिदं वाक्यं दुःखिताः प्रणताः स्थिताः ।
एकपुत्रविहीनानां सर्वेषां जीवितार्थिनाम् ।। ११२ ।।
पुत्रस्य नो जीवदानाज्जीवितं दातुमर्हसि ।
तब वे दुखी मनुष्य भगवान्‌को प्रणाम करके खड़े हो गये और इस प्रकार बोले—'प्रभो! इस इकलौते पुत्रसे हीन होकर हम मृतकतुल्य हो रहे हैं। आप हमारे इस पुत्रको जीवित करके हम समस्त जीवनार्थियोंको जीवनदान देनेकी कृपा करें' ।। ११२ १/२ ।।

एवमुक्तः स भगवान् वारिपूर्णेन चक्षुषा ।। ११३ ।।