भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1018

जीवितं स्म कुमाराय प्रादाद् वर्षशतानि वै । उन्होंने जब नेत्रोंमें आँसू भरकर भगवान् शंकरसे इस प्रकार प्रार्थना की, तब उन्होंने उस बालकको जीवित कर दिया और उसे सौ वर्षोंकी आयु प्रदान की ।। ११३ १/२ ।। तथा गोमायुगृध्राभ्यां प्राददत् क्षुद्विनाशनम् ।। ११४ ।। वरं पिनाकी भगवान् सर्वभूतहिते रतः । इतना ही नहीं, सर्वभूतहितकारी पिनाकपाणि भगवान् शिवने गीध और गीदड़को भी उनकी भूख मिट जानेका वरदान दे दिया ।। ११४ १/२ ।। ततः प्रणम्य ते देवं प्रायो हर्षसमन्विताः ।। ११५ ।। कृतकृत्याः सुखं हृष्टाः प्रातिष्ठन्त तदा विभो । राजन्! तब वे सब लोग हर्षसे उल्लसित एवं कृतकार्य हो महादेवजीको प्रणाम करके सुख और प्रसन्नताके साथ वहाँसे चले गये ।। ११५ १/२ ।। अनिर्वेदेन दीर्घेण निश्चयेन ध्रुवेण च ।। ११६ ।। देवदेवप्रसादाच्च क्षिप्रं फलमवाप्यते । यदि मनुष्य उकताहटमें न पड़कर दृढ़ एवं प्रबल निश्चयके साथ प्रयत्न करता रहे तो देवाधिदेव भगवान् शिवके प्रसादसे शीघ्र ही मनोवांछित फल पा लेता है ।। ११६ १/२ ।। पश्य दैवस्य संयोगं बान्धवानां च निश्चयम् ।। ११७ ।। कृपणानां तु रुदतां कृतमश्रुप्रमार्जनम् । पश्य चाल्पेन कालेन निश्चयान्वेषणेन च ।। ११८ ।। देखो, दैवका संयोग और उन बन्धु-बान्धवोंका दृढ़ निश्चय; जिससे दीनतापूर्वक रोते हुए उन मनुष्योंका आँसू थोड़े ही समयमें पोंछा गया। यह उनके निश्चयपूर्वक किये हुए अनुसंधान एवं प्रयत्नका फल है ।। ११७-११८ ।। प्रसादं शङ्करात् प्राप्य दुःखिताः सुखमाप्नुवन् । ते विस्मिताः प्रहृष्टाश्च पुत्रसंजीवनात् पुनः ।। ११९ ।। भगवान् शंकरकी कृपासे उन दुखी मनुष्योंने सुख प्राप्त कर लिया। पुत्रके पुनर्जीवनसे वे आश्चर्यचकित एवं प्रसन्न हो उठे ।। ११९ ।। बभूवुर्भरतश्रेष्ठ प्रसादाच्छङ्करस्य वै । ततस्ते त्वरिता राजंस्त्यक्त्वा शोकं शिशुद्भवम् ।। १२० ।। विविशुः पुत्रमादाय नगरं हृष्टमानसाः । राजन्! भरतश्रेष्ठ! भगवान् शंकरकी कृपासे वे सब लोग तुरंत ही पुत्रशोक त्यागकर प्रसन्नचित्त हो पुत्रको साथ ले अपने नगरको चले गये ।। १२० १/२ ।। एषा बुद्धिः समस्तानां चातुर्वर्ण्ये निदर्शिता ।। १२१ ।। धर्मार्थमोक्षसंयुक्तमितिहासमिमं शुभम् ।