महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउस वृक्षकी लंबाई चार सौ हाथकी थी। छाया बड़ी सघन थी। उसपर तोते और मैनाओंके समूह बसेरा लेते थे। वह वृक्ष फल और फूल दोनोंसे ही भरा था ॥ ७ ॥ सार्थिका वणिजश्चापि तापसाश्च वनौकसः । वसन्ति तत्र मार्गस्थाः सुरम्ये नगसत्तमे ॥ ८ ॥ दल बाँधकर यात्रा करनेवाले वणिक्, वनवासी तपस्वी तथा दूसरे राहगीर भी उस रमणीय एवं श्रेष्ठ वृक्षके नीचे निवास किया करते थे ॥ ८ ॥ तस्य ता विपुलाः शाखा दृष्ट्वा स्कन्धं च सर्वशः । अभिगम्याब्रवीदेनं नारदो भरतर्षभ ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस वृक्षकी बड़ी-बड़ी शाखाओं तथा मोटे तनोंको देखकर देवर्षि नारद उसके पास गये और इस प्रकार बोले— ॥ ९ ॥ अहो नु रमणीयस्त्वमहो चासि मनोहरः । प्रीयामहे त्वया नित्यं तरुप्रवर शाल्मले ॥ १० ॥ अहो! शाल्मले! तुम बड़े रमणीय और मनोहर हो। तरुप्रवर! तुमसे हमें सदा प्रसन्नता प्राप्त होती है ॥ १० ॥