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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

उस वृक्षकी लंबाई चार सौ हाथकी थी। छाया बड़ी सघन थी। उसपर तोते और मैनाओंके समूह बसेरा लेते थे। वह वृक्ष फल और फूल दोनोंसे ही भरा था ॥ ७ ॥ सार्थिका वणिजश्चापि तापसाश्च वनौकसः । वसन्ति तत्र मार्गस्थाः सुरम्ये नगसत्तमे ॥ ८ ॥ दल बाँधकर यात्रा करनेवाले वणिक्, वनवासी तपस्वी तथा दूसरे राहगीर भी उस रमणीय एवं श्रेष्ठ वृक्षके नीचे निवास किया करते थे ॥ ८ ॥ तस्य ता विपुलाः शाखा दृष्ट्वा स्कन्धं च सर्वशः । अभिगम्याब्रवीदेनं नारदो भरतर्षभ ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस वृक्षकी बड़ी-बड़ी शाखाओं तथा मोटे तनोंको देखकर देवर्षि नारद उसके पास गये और इस प्रकार बोले— ॥ ९ ॥ अहो नु रमणीयस्त्वमहो चासि मनोहरः । प्रीयामहे त्वया नित्यं तरुप्रवर शाल्मले ॥ १० ॥ अहो! शाल्मले! तुम बड़े रमणीय और मनोहर हो। तरुप्रवर! तुमसे हमें सदा प्रसन्नता प्राप्त होती है ॥ १० ॥

अध्याय (पृष्ठ 1022)

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मरे हुए ब्राह्मण-बालकपर तथा गीध एवं गीदड़पर शङ्करजीकी कृपा

सदैव शकुनास्तात मृगाश्चाथ तथा गजाः । वसन्ति तव संहृष्टा मनोहर मनोहराः ॥ ११ ॥ ‘तात! मनोहर वृक्षराज! तुम्हारी शाखाओंपर सदा ही बहुत-से पक्षी तथा नीचे अनेकानेक मृग एवं हाथी प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं ॥ ११ ॥

तव शाखा महाशाख स्कन्धांश्च विपुलांस्तथा । न वै प्रभग्नान् पश्यामि मारुतेन कथंचन ॥ १२ ॥ ‘महान् शाखाओंसे सुशोभित वनस्पते! मैं देखता हूँ कि तुम्हारी शाखाओं और मोटे तनोंको वायुदेव भी किसी तरह तोड़ नहीं सके हैं ॥ १२ ॥

किं नु ते पवनस्तात प्रीतिमानथवा सुहृत् । त्वां रक्षति सदा येन वनेऽत्र पवनो ध्रुवम् ॥ १३ ॥ ‘तात! क्या पवनदेव तुमसे किसी कारणवश विशेष प्रसन्न रहते हैं अथवा वे तुम्हारे सुहृद् हैं, जिससे इस वनमें सदा तुम्हारी निश्चितरूपसे रक्षा करते हैं ॥

भगवान् पवनः स्थानाद् वृक्षानुच्चावचानपि । पर्वतानां च शिखराण्याचालयति वेगवान् ॥ १४ ॥ ‘भगवान् वायु इतने वेगशाली हैं कि छोटे-बड़े वृक्षोंको कौन कहे, पर्वतोंके शिखरोंको भी अपने स्थानसे हिला देते हैं ॥ १४ ॥

शोषयत्येव पातालं बहन् गन्धवहः शुचिः । सरांसि सरितश्चैव सागरांश्च तथैव च ॥ १५ ॥ ‘गन्धवाही पवित्र पवन पाताल, सरोवर, सरिताओं और समुद्रोंको भी सुखा सकता है ॥ १५ ॥

संरक्षति त्वां पवनः सखित्वेन न संशयः । तस्मात् त्वं बहुशाखोऽपि पर्णवान् पुष्पवानपि ॥ १६ ॥ ‘इसमें संदेह नहीं कि वायुदेव तुम्हें अपना मित्र माननेके कारण ही तुम्हारी रक्षा करते हैं; इसीलिये तुम अनेक शाखाओंसे सम्पन्न तथा पत्ते और पुष्पोंसे हरे-भरे हो ॥ १६ ॥

इदं च रमणीयं ते प्रतिभाति वनस्पते । यदिमे विहगास्तात रमन्ते मुदितास्त्वयि ॥ १७ ॥ ‘तात वनस्पते! तुम्हारे पास यह बड़ा ही रमणीय दृश्य जान पड़ता है कि ये पक्षी तुम्हारी शाखाओंपर बड़े प्रसन्न रहकर रमण कर रहे हैं ॥ १७ ॥

एषां पृथक् समस्तानां श्रूयते मधुरस्वरः । पुष्पसम्मोदने काले वाशतां सुमनोहरम् ॥ १८ ॥ ‘वसन्त ऋतुमें अत्यन्त मनोरम बोली बोलनेवाले इन पक्षियोंका अलग-अलग तथा सबका एक साथ बड़ा मधुर स्वर सुनायी पड़ता है ॥ १८ ॥

तथेमे गर्जिता नागाः स्वयूथकुलशोभिताः ।

घर्मार्तास्त्वां समासाद्य सुखं विन्दन्ति शाल्मले ।। १९ ।।
‘शाल्मले! अपने यूथकुलसे सुशोभित ये गर्जना करते हुए गजराज धूपसे पीड़ित हो तुम्हारे पास आकर सुख पाते हैं ।। १९ ।।
तथैव मृगजातीभिरन्याभिरभिशोभसे ।
तथा सर्वाधिवासैश्च शोभसे मेरुवद्द्रुम ।। २० ।।
‘वृक्षप्रवर! इसी प्रकार दूसरी-दूसरी जातिके पशु भी तुम्हारी शोभा बढ़ा रहे हैं। तुम सबके निवास-स्थान होनेके कारण मेरुपर्वतके समान सुशोभित होते हो ।। २० ।।
ब्राह्मणैश्च तपःसिद्धैस्तापसैः श्रमणैस्तथा ।
त्रिविष्टपसमं मन्ये तवायतनमेव हि ।। २१ ।।
‘तपस्यासे शुद्ध हुए तापसों, ब्राह्मणों तथा श्रमणोंसे संयुक्त हो तुम्हारा यह स्थान मुझे स्वर्गके समान जान पड़ता है’ ।। २१ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें वायु और शाल्मलिसंवादके प्रसंगमें एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५४ ।।

१५५-

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पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

नारदजीका सेमल-वृक्षको उसका अहंकार देखकर फटकारना

नारद उवाच

बन्धुत्वादथवा सख्याच्छाल्मले नात्र संशयः ।
पालयत्येव सततं भीमः सर्वत्रगोऽनिलः ॥ १ ॥
**नारदजीने कहा—**शाल्मले! इसमें संशय नहीं कि तुम्हें अपना बन्धु अथवा मित्र माननेके कारण ही सर्वत्रगामी भयानक वायुदेव सदा तुम्हारी रक्षा करते हैं ॥ १ ॥

न्यग्भावं परमं वायोः शाल्मले त्वमुपागतः ।
तवाह्मस्मीति सदा येन रक्षति मारुतः ॥ २ ॥
शाल्मले! मालूम होता है, तुम वायुके सामने अत्यन्त विनम्र होकर कहते हो कि 'मैं तो आपका ही हूँ' इसीसे वह सदा तुम्हारी रक्षा करता है ॥ २ ॥

न तं पश्याम्यहं वृक्षं पर्वतं वेश्म चेदृशम् ।
यं न वायुबलाद् भग्नं पृथिव्यामिति मे मतिः ॥ ३ ॥
मैं इस भूतलपर ऐसे किसी वृक्ष, पर्वत या घरको नहीं देखता, जो वायुके बलसे भग्न न हो जाय। मेरा यही विश्वास है कि वायुदेव सबको तोड़कर गिरा सकते हैं ॥ ३ ॥

त्वं पुनः कारणैर्नूनं रक्ष्यसे शाल्मले यथा ।
वायुना सपरीवारस्तेन तिष्ठस्यसंशयम् ॥ ४ ॥
शाल्मले! कुछ ऐसे कारण अवश्य हैं, जिनसे प्रेरित होकर वायुदेव निश्चितरूपसे सपरिवार तुम्हारी रक्षा करते हैं। निस्सन्देह इसीसे यों ही खड़े रहते हो ॥

शाल्मलिरुवाच

न मे वायुः सखा ब्रह्मन् न बन्धुर्न च मे सुहृत् ।
परमेष्ठी तथा नैव येन रक्षति वानिलः ॥ ५ ॥
**सेमलने कहा—**ब्रह्मन्! वायु न तो मेरा मित्र है, न बन्धु है, न सुहृद् ही है। वह ब्रह्मा भी नहीं है, जो मेरी रक्षा करेगा ॥ ५ ॥

मम तेजो बलं भीमं वायोरपि हि नारद ।
कलामष्टादशीं प्राणैर्न मे प्राप्नोति मारुतः ॥ ६ ॥
नारद! मेरा तेज और बल वायुसे भी भयंकर है। वायु अपनी प्राणशक्तिके द्वारा मेरी अठारहवीं कलाको भी नहीं पा सकता ॥ ६ ॥

आगच्छन् परुषो वायुर्मया विष्टम्भितो बलात् ।

भञ्जन् द्रुमान् पर्वतांश्च यच्चान्यदपि किंचन ॥ ७ ॥ जिस समय वायुदेवता वृक्ष, पर्वत तथा दूसरी वस्तुओंको तोड़ता-फोड़ता हुआ मेरे पास पहुँचता है, उस समय मैं बलसे उसकी गतिको रोक देता हूँ ॥ ७ ॥ स मया बहुशो भग्नः प्रभञ्जन् वै प्रभञ्जनः । तस्मान्न बिभ्ये देवर्षे क्रुद्धादपि समीरणात् ॥ ८ ॥ देवर्षे! इस प्रकार मैंने तोड़-फोड़ करनेवाले वायुकी गतिको अनेक बार रोक दिया है; अतः वह कुपित हो जाय तो भी मुझे उससे भय नहीं है ॥ ८ ॥

नारद उवाच

शाल्मले विपरीतं ते दर्शनं नात्र संशयः । न हि वायोर्बलेनास्ति भूतं तुल्यबलं क्वचित् ॥ ९ ॥ नारदजीने कहा— शाल्मले! इस विषयमें तुम्हारी दृष्टि विपरीत है—समझ उलटी हो गयी है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि वायुके बलके समान किसी भी प्राणीका बल नहीं है ॥ ९ ॥ इन्द्रो यमो वैश्रवणो वरुणश्च जलेश्वरः । नैतेऽपि तुल्या मरुतः किं पुनस्त्वं वनस्पते ॥ १० ॥ वनस्पते! इन्द्र, यम, कुबेर तथा जलके स्वामी वरुण—ये भी वायुके तुल्य बलशाली नहीं हैं; फिर तुम जैसे साधारण वृक्षकी तो बात ही क्या है? ॥ १० ॥ यच्च किंचिदिह प्राणी चेष्टते शाल्मले भुवि । सर्वत्र भगवान् वायुश्चेष्टाप्राणकरः प्रभुः ॥ ११ ॥ शाल्मले! प्राणी इस पृथ्वीपर जो कुछ भी चेष्टा करता है, उस चेष्टाकी शक्ति तथा जीवन देनेवाले सर्वत्र सामर्थ्यशाली भगवान् वायु ही हैं ॥ ११ ॥ एष चेष्टयते सम्यक् प्राणिनः सम्यगायातः । असम्यगायतो भूयश्चेष्टते विकृतं नृषु ॥ १२ ॥ ये जब शरीरमें ठीक ढंगसे प्राण आदिके रूपमें विस्तारको प्राप्त होते हैं, तब समस्त प्राणियोंको चेष्टाशील बनाते हैं और जब ये ठीक ढंगसे काम नहीं करते हैं, तब प्राणियोंके शरीरमें विकृति आने लगती है ॥ १२ ॥ स त्वमेवंविधं वायुं सर्वसत्त्वभृतां वरम् । न पूजयसि पूज्यं तं किमन्यद् बुद्धिलाघवात् ॥ १३ ॥ इस प्रकार समस्त बलवानोंमें श्रेष्ठ एवं पूजनीय वायुदेवकी जो तुम पूजा नहीं करते हो, यह तुम्हारी बुद्धिकी लघुताके सिवा और क्या है ॥ १३ ॥ असारश्चापि दुर्मेधाः केवलं बहु भाषसे । क्रोधादिभिरवच्छन्नो मिथ्या वदसि शाल्मले ॥ १४ ॥

शाल्मले! तुम सारहीन और दुर्बुद्धि हो, केवल बहुत बातें बनाते हो तथा क्रोध आदि दुर्गुणोंसे प्रेरित होकर झूठ बोलते हो ॥ १४ ॥
मम रोषः समुत्पन्नस्त्वय्येवं सम्प्रभाषति ।
ब्रवीम्येष स्वयं वायोस्तव दुर्भाषितं बहु ॥ १५ ॥
तुम्हारे इस तरह बातचीत करनेसे मेरे मनमें रोष उत्पन्न हुआ है; अतः मैं स्वयं वायुके सामने तुम्हारे इन दुर्वचनोंको सुनाऊँगा ॥ १५ ॥
चन्दनैः स्यन्दनैः शालैः सरलैर्देवदारुभिः ।
वेतसैर्धन्वनाँश्चापि ये चान्ये बलवत्तराः ॥ १६ ॥
तैश्चापि नैवं दुर्बुद्धे क्षिप्तो वायुः कृतात्मभिः ।
तेऽपि जानन्ति वायोश्च बलमात्मन एव च ॥ १७ ॥
तस्मात् तं वै नमस्यन्ति श्वसनं तरुसत्तमाः ।
चन्दन, स्यन्दन (तिनिश), शाल, सरल, देवदारु, वेतस (बेत), धामिन तथा अन्य जो बलवान् वृक्ष हैं, उन जितात्मा वृक्षोंने भी कभी इस प्रकार वायु-देवपर आक्षेप नहीं किया है। दुर्बुद्धे! वे भी अपने और वायुके बलको अच्छी तरह जानते हैं; इसीलिये वे श्रेष्ठ वृक्ष वायुदेवके सामने मस्तक झुका देते हैं ॥ १६-१७ १/२ ॥
त्वं तु मोहान्न जानीषे वायोर्बलमनन्तकम् ।
एवं तस्माद् गमिष्यामि सकाशं मातरिश्वनः ॥ १८ ॥
तुम तो मोहवश वायुके अनन्त बलको कुछ समझते ही नहीं हो; अतः अब मैं यहाँसे सीधे वायुदेवके ही पास जाऊँगा ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे
पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पवन-शाल्मलिसंवादविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५५ ॥

१५६-

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षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

नारदजीकी बात सुनकर वायुका सेमलको धमकाना और सेमलका वायुको तिरस्कृत करके विचारमग्न होना

भीष्म उवाच

एवमुक्त्वा तु राजेन्द्र शाल्मलिं ब्रह्मवित्तमः ।
नारदः पवने सर्वं शाल्मलेर्वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजेन्द्र! सेमलसे ऐसा कहकर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजीने वायुदेवके पास आकर उसकी सब बातें कह सुनायीं ॥ १ ॥

नारद उवाच

हिमवत्पृष्ठजः कश्चिच्छाल्मलिः परिवारवान् ।
बृहन्मूलो बृहच्छायः स त्वां वायोऽवमन्यते ॥ २ ॥
**नारदजीने कहा—**वायुदेव! हिमालयके पृष्ठभागपर एक सेमलका वृक्ष है, जो बहुत बड़े परिवारके साथ है। उसकी छाया विशाल और घनी है और जड़ें बहुत दूरतक फैली हैं। वह तुम्हारा अपमान करता है ॥ २ ॥

बहुव्याक्षेपयुक्तानि त्वामाह वचनानि सः ।
न युक्तानि मया वायो तानि वक्तुं तवाग्रतः ॥ ३ ॥
उसने तुम्हारे प्रति बहुत-से ऐसे आक्षेपयुक्त वचन कहे हैं, जिन्हें तुम्हारे सामने मुझे कहना उचित नहीं है ॥ ३ ॥

जानामि त्वामहं वायो सर्वप्राणभृतां वरम् ।
वरिष्ठं च गरिष्ठं च क्रोधे वैवस्वतं यथा ॥ ४ ॥
पवनदेव! मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम समस्त प्राण-धारियोंमें श्रेष्ठ, महान् एवं गौरवशाली हो त था क्रोधमें वैवस्वत यमके समान हो ॥ ४ ॥

भीष्म उवाच

एतत् तु वचनं श्रुत्वा नारदस्य समीरणः ।
शाल्मलिं तमुपागम्य क्रुद्धो वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! नारदजीकी यह बात सुनकर वायुदेवने शाल्मलिके पास जा कुपित होकर कहा ॥ ५ ॥

वायुरुवाच

शाल्मले नारदो गच्छंस्त्वयोक्तो मद्दिगर्हणम् ।

अहं वायुः प्रभावं ते दर्शयाम्यात्मनो बलम् ॥ ६ ॥ **वायु बोले—**सेमल! तुमने इधरसे जाते हुए नारदजीसे मेरी निन्दा की है। मैं वायु हूँ। तुम्हें अपना बल और प्रभाव दिखाता हूँ ॥ ६ ॥ अहं त्वामभिजानामि विदितश्चासि मे द्रुम । पितामहः प्रजासर्गे त्वयि विश्रान्तवान् प्रभुः ॥ ७ ॥ वृक्ष! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारे विषयमें मुझे सब कुछ ज्ञात है। भगवान् ब्रह्माजीने प्रजाकी सृष्टि करते समय तुम्हारी छायामें विश्राम किया था ॥ ७ ॥ तस्य विश्रमणादेष प्रसादो मत्कृतस्तव । रक्ष्यसे तेन दुर्बुद्धे नात्मवीर्याद् द्रुमाधम ॥ ८ ॥ दुर्बुद्धे! उनके विश्राम करनेसे ही मैंने तुमपर यह कृपा की थी, इसीसे तुम्हारी रक्षा हो रही है। द्रुमाधम! तुम अपने बलसे नहीं बचे हुए हो ॥ ८ ॥ यन्मां त्वमवजानीषे यथान्यं प्राकृतं तथा । दर्शयाम्येष चात्मानं यथा मां नावमन्यसे ॥ ९ ॥ परंतु तुम अन्य प्राकृतिक मनुष्यकी भाँति जो मेरा अपमान कर रहे हो, इससे कुपित होकर मैं अपना वह स्वरूप दिखाऊँगा, जिससे तुम फिर मेरा अपमान नहीं करोगे ॥ ९ ॥

भीष्म उवाच

एवमुक्तस्ततः प्राह शाल्मलिः प्रहसन्निव । पवन त्वं च मे क्रुद्धो दर्शयात्मानमात्मना ॥ १० ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! पवनदेवके ऐसा कहनेपर सेमलने हँसते हुए-से कहा—'पवन! तुम कुपित होकर स्वयं ही अपनी सारी शक्ति दिखाओ ॥ १० ॥ मयि वै त्यज्यतां क्रोधः किं मे क्रुद्धः करिष्यसि । न ते बिभेमि पवन यद्यपि त्वं स्वयं प्रभुः ॥ ११ ॥ 'मेरे ऊपर अपना क्रोध उतारो। तुम कुपित होकर मेरा क्या कर लोगे। पवन! यद्यपि तुम स्वयं बड़े प्रभावशाली हो; फिर भी मैं तुमसे डरता नहीं हूँ ॥ ११ ॥ बलाधिकोऽहं त्वत्तश्च न भीः कार्या मया तव । ये तु बुद्ध्या हि बलिनस्ते भवन्ति बलीयसः ॥ १२ ॥ प्राणमात्रबला ये वै नैव ते बलिनो मताः । 'मैं बलमें तुमसे बहुत बढ़-चढ़कर हूँ; अतः मुझे तुमसे भय नहीं मानना चाहिये। जो बुद्धिके बली होते हैं, वे ही बलिष्ठ माने जाते हैं। जिनमें केवल शारीरिक बल होता है, वे वास्तवमें बलवान् नहीं समझे जाते' ॥ १२ १/२ ॥ इत्येवमुक्तः पवनः श्व इत्येवाब्रवीद् वचः ॥ १३ ॥ दर्शयिष्यामि ते तेजस्ततो रात्रिरुपागमत् ।

सेमलके ऐसा कहनेपर वायुने कहा—'अच्छा, कल मैं तुम्हें अपना पराक्रम दिखाऊँगा।' इतनेमें ही रात आ गयी ॥ १३ १/२ ॥ अथ निश्चित्य मनसा शाल्मलिर्वातकारितम् ॥ १४ ॥ पश्यमानस्तदाऽऽत्मानमसमं मातरिश्वना । उस समय सेमलने वायुके द्वारा जो कुछ किया जानेवाला था, उसपर मन-ही-मन विचार करके तथा अपने आपको वायुके समान बलवान् न देखकर सोचा— ॥ १४ १/२ ॥ नारदे यन्मया प्रोक्तं वचनं प्रति तन्मृषा ॥ १५ ॥ असमर्थो ह्यहं वायोर्बलेन बलवान् हि सः । 'अहो! मैंने नारदजीसे जो बातें कही थीं, वे सब झूठी थीं। मैं वायुका सामना करनेमें असमर्थ हूँ; क्योंकि वे बलमें मुझसे बढ़े हुए हैं ॥ १५ १/२ ॥ मारुतो बलवान् नित्यं यथा वै नारदोऽब्रवीत् ॥ १६ ॥ अहं तु दुर्बलोऽन्येभ्यो वृक्षेभ्यो नात्र संशयः । किं तु बुद्ध्या समो नास्ति मया कश्चिद् वनस्पतिः ॥ १७ ॥ 'जैसा कि नारदजीने कहा था, वायुदेव नित्य बलवान् हैं। मैं तो दूसरे वृक्षोंसे भी दुर्बल हूँ, इसमें संशय नहीं है; परंतु बुद्धिमें कोई भी वृक्ष मेरे समान नहीं है ॥ १६-१७ ॥ तदहं बुद्धिमास्थाय भयं मोक्ष्ये समीरणात् । यदि तां बुद्धिमास्थाय तिष्ठेयुः पर्णिनो वने ॥ १८ ॥ अरिष्टाः स्युः सदा क्रुद्धात् पवनान्नात्र संशयः । 'मैं बुद्धिका आश्रय लेकर वायुके भयसे छुटकारा पाऊँगा। यदि वनमें रहनेवाले दूसरे वृक्ष भी उसी बुद्धिका सहारा लेकर रहें तो निःसंदेह कुपित वायुसे उनका कोई अनिष्ट नहीं होगा ॥ १८ १/२ ॥ ते तु बाला न जानन्ति यथा वै तान् समीरणः । समीरयति संक्रुद्धो यथा जानाम्यहं तथा ॥ १९ ॥ 'परंतु वे मूर्ख हैं; अतः वायुदेव जिस प्रकार कुपित होकर उन्हें दबाते हैं, उसका उन्हें ज्ञान नहीं है। मैं यह सब अच्छी तरह जानता हूँ' ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पवन-शाल्मलि-संवादविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५६ ॥

१५७-

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सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

सेमलका हार स्वीकार करना तथा बलवान्‌के साथ वैर न करनेका उपदेश

भीष्म उवाच

ततो निश्चित्य मनसा शाल्मलिः क्षुभितस्तदा ।
शाखाः स्कन्धान् प्रशाखाश्च स्वयमेव व्यशातयत् ॥ १ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! मन-ही-मन ऐसा विचारकर सेमलने क्षुभित हो अपनी शाखाओं, डालियों तथा टहनियोंको स्वयं ही नीचे गिरा दिया ॥ १ ॥

स परित्यज्य शाखाश्च पत्राणि कुसुमानि च ।
प्रभाते वायुमायान्तं प्रत्यैक्षत वनस्पतिः ॥ २ ॥
वह वनस्पति अपनी शाखाओं, पत्तों और फूलोंको त्यागकर प्रातःकाल वायुके आनेकी प्रतीक्षा करने लगा ॥ २ ॥

ततः क्रुद्धः श्वसन् वायुः पातयन् वै महाद्रुमान् ।
आजगामाथ तं देशमास्ते यत्र स शाल्मलिः ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् सबेरा होनेपर वायुदेव कुपित हो बड़े-बड़े वृक्षोंको धराशायी करते हुए उस स्थानपर आये, जहाँ वह सेमलका वृक्ष था ॥ ३ ॥

तं हीनपर्णं पतिताग्रशाखं
निशीर्णपुष्पं प्रसमीक्ष्य वायुः ।
उवाच वाक्यं स्मयमान एवं
मुदा युतः शाल्मलिमुग्रशाखम् ॥ ४ ॥
वायुने देखा कि सेमलके पत्ते गिर गये हैं और उसकी श्रेष्ठ शाखाएँ धराशायी हो गयी हैं। यह फूलोंसे भी हीन हो चुका है, तब वे बड़े प्रसन्न हुए और जिसकी शाखाएँ पहले बड़ी भयंकर थीं, उस सेमलसे मुसकराते हुए इस प्रकार बोले ॥ ४ ॥

वायुरुवाच

अहमप्येवमेव त्वां कुर्वाणः शाल्मले रुषा ।
आत्मना यत्कृतं कृच्छ्रं शाखानामपकर्षणम् ॥ ५ ॥
हीनपुष्पाग्रशाखस्त्वं शीर्णाङ्कुरपलाशकः ।
आत्मदुर्मन्त्रितेनेह मद्धैर्यवशगः कृतः ॥ ६ ॥
**वायुने कहा—**शाल्मले! मैं भी रोषमें भरकर तुम्हें ऐसा ही बना देना चाहता था। तुमने स्वयं ही यह कष्ट स्वीकार कर लिया है, तुम्हारी शाखाएँ गिर गयीं, फूल पत्ते, डालियाँ और

अंकुर सभी नष्ट हो गये। तुमने अपनी ही कुमतिसे यह विपत्ति मोल ली है। तुम्हें मेरे बल और पराक्रमका शिकार बनना पड़ा है ॥ ५-६ ॥

भीष्म उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचो वायोः शाल्मलिर्व्रीडितस्तदा । अतप्यत वचः स्मृत्वा नारदो यत् तदाब्रवीत् ॥ ७ ॥ भीष्मजी कहते हैं— राजन्! वायुका यह वचन सुनकर सेमल उस समय लज्जित हो गया और नारदजीने जो कुछ कहा था, उसे याद करके वह बहुत पछताने लगा ॥ ७ ॥

एवं हि राजशार्दूल दुर्बलः सन् बलीयसा । वैरमारभते बालस्तप्यते शाल्मलिर्यथा ॥ ८ ॥ नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार जो मूर्ख मनुष्य स्वयं दुर्बल होकर किसी बलवान्‌के साथ वैर बाँध लेता है, वह सेमलके समान ही संतापका भागी होता है ॥ ८ ॥

तस्माद् वैरं न कुर्वीत दुर्बलो बलवत्तरैः । शोचेद्धि वैरं कुर्वाणो यथा वै शाल्मलिस्तथा ॥ ९ ॥ अतः दुर्बल मनुष्य बलवानोंके साथ वैर न करे। यदि वह करता है तो सेमलके समान ही शोचनीय दशाको पहुँचकर शोकमग्न होता है ॥ ९ ॥

न हि वैरं महात्मानो विवृण्वन्त्यपकारिषु । शनैः शनैर्महाराज दर्शयन्ति स्म ते बलम् ॥ १० ॥ महाराज! महामनस्वी पुरुष अपनी बुराई करने-वालोंपर वैरभाव नहीं प्रकट करते हैं। वे धीरे-धीरे ही अपना बल दिखाते हैं ॥ १० ॥

वैरं न कुर्वीत नरो दुर्बुद्धिर्बुद्धिजीविना । बुद्धिर्बुद्धिमतो याति तृणेष्विव हुताशनः ॥ ११ ॥ खोटी बुद्धिवाला मनुष्य किसी बुद्धिजीवी पुरुषसे वैर न बाँधे; क्योंकि घास-फूँसपर फैलनेवाली आगके समान बुद्धिमानोंकी बुद्धि सर्वत्र पहुँच जाती है ॥ ११ ॥

न हि बुद्ध्या समं किंचिद् विद्यते पुरुषे नृप । तथा बलेन राजेन्द्र न समोऽस्तीह कश्चन ॥ १२ ॥ नरेश्वर! राजेन्द्र! पुरुषमें बुद्धिके समान दूसरी कोई वस्तु नहीं है। संसारमें जो बुद्धि-बलसे युक्त है, उसकी समानता करनेवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं है ॥ १२ ॥

तस्मात् क्षमेत बालाय जडान्धबधिराय च । बलाधिकाय राजेन्द्र तद् दृष्टं त्वयि शत्रुहन् ॥ १३ ॥ शत्रुओंका नाश करनेवाले राजेन्द्र! इसलिये जो बालक, जड, अन्ध, बधिर, तथा बलमें अपनेसे बढ़ा-चढ़ा हो, उसके द्वारा किये गये प्रतिकूल बर्ताव को भी क्षमा कर देना चाहिये; यह क्षमाभाव तुम्हारे भीतर विद्यमान है ॥ १३ ॥

अक्षौहिण्यो दशैका च सप्त चैव महाद्युते ।
बलेन न समा राजन्नर्जुनस्य महात्मनः ॥ १४ ॥
महातेजस्वी नरेश! अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ भी बलमें महात्मा अर्जुनके समान नहीं हैं ॥ १४ ॥
निहताश्चैव भग्नाश्च पाण्डवेन यशस्विना ।
चरता बलमास्थाय पाकशासनिना मृधे ॥ १५ ॥
इन्द्र और पाण्डुके यशस्वी पुत्र अर्जुनने अपने बलका भरोसा करते हुए युद्धमें विचरते हुए यहाँ उन समस्त सेनाओंको मार डाला और भगा दिया ॥ १५ ॥
उक्ताश्च ते राजधर्मा आपद्धर्माश्च भारत ।
विस्तरेण महाराज किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १६ ॥
भरतनन्दन! महाराज! मैंने तुमसे राजधर्म और आपद्धर्मका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, अब और क्या सुनना चाहते हो ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पवन-शाल्मलिसंवादविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५७ ॥

समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण

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अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण

युधिष्ठिर उवाच

पापस्य यदधिष्ठानं यतः पापं प्रवर्तते ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! मैं यथार्थरूपसे यह सुनना चाहता हूँ कि पापका अधिष्ठान क्या है और किससे उसकी प्रवृत्ति होती है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

पापस्य यदधिष्ठानं तच्छृणुष्व नराधिप ।
एको लोभो महाग्राहो लोभात् पापं प्रवर्तते ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— नरेश्वर! पापका जो अधिष्ठान है, उसे सुनो। एकमात्र लोभ ही पापका अधिष्ठान है। वह मनुष्यको निगल जानेके लिये एक बड़ा ग्राह है। लोभसे ही पापकी प्रवृत्ति होती है ॥ २ ॥

अतः पापमधर्मश्च यथा दुःखमनुत्तमम् ।
निकृत्या मूलमेतद्धि येन पापकृतो जनाः ॥ ३ ॥
लोभसे ही पाप, अधर्म तथा महान् दुःखकी उत्पत्ति होती है। शठता तथा छल-कपटका भी मूल कारण लोभ ही है। इसीके कारण मनुष्य पापाचारी हो जाते हैं ॥ ३ ॥

लोभात् क्रोधः प्रभवति लोभात् कामः प्रवर्तते ।
लोभान्मोहश्च माया च मानः स्तम्भः परासुता ॥ ४ ॥
लोभसे ही क्रोध प्रकट होता है, लोभसे ही कामकी प्रवृत्ति होती है और लोभसे ही माया, मोह, अभिमान उद्दण्डता तथा पराधीनता आदि दोष प्रकट होते हैं ॥ ४ ॥

अक्षमा ह्रीपरित्यागः श्रीनाशो धर्मसंक्षयः ।
अभिध्याप्रख्यता चैव सर्वं लोभात् प्रवर्तते ॥ ५ ॥
असहनशीलता, निर्लज्जता, सम्पत्तिनाश, धर्मक्षय, चिन्ता और अपयश—ये सब लोभसे ही सम्भव होते हैं ॥ ५ ॥

अत्यागश्चातितर्षश्च विकर्मसु च याः क्रियाः ।
कुलविद्यामदश्चैव रूपैश्वर्यमदस्तथा ॥ ६ ॥
सर्वभूतेष्वभिद्रोहः सर्वभूतेष्वसत्कृतिः ।
सर्वभूतेष्वविश्वासः सर्वभूतेष्वनार्जवम् ॥ ७ ॥

लोभसे ही कृपणता, अत्यन्त तृष्णा, शास्त्रविरुद्ध कर्मोंमें प्रवृत्ति, कुल और विद्याविषयक अभिमान, रूप और ऐश्वर्यका मद, समस्त प्राणियोंके प्रति द्रोह, सबका तिरस्कार, सबके प्रति अविश्वास तथा कुटिलतापूर्ण बर्ताव होते हैं ।। ६-७ ।।

हरणं परवित्तानां परदाराभिमर्शनम् ।
वाग्वेगो मनसो वेगो निन्दावेगस्तथैव च ।। ८ ।।
उपस्थोदरयोर्वेगो मृत्युवेगश्च दारुणः ।
ईर्ष्यावेगश्च बलवान् मिथ्यावेगश्च दुर्जयः ।। ९ ।।
रसवेगश्च दुर्वार्यः श्रोत्रवेगश्च दुःसहः ।
कुत्सा विकत्था मात्सर्यं पापं दुष्करकारिता ।। १० ।।
साहसानां च सर्वेषामकार्याणां क्रियास्तथा ।
पराये धनका अपहरण, परायी स्त्रियोंके प्रति बलात्कार, वाणीका वेग, मनका वेग, निन्दा करनेकी विशेष प्रवृत्ति, जननेन्द्रियका वेग, उदरका वेग, मृत्युका भयंकर वेग अर्थात् आत्महत्या, ईर्ष्याका प्रबल वेग, मिथ्या का दुर्जय वेग, अनिवार्य रसनेन्द्रियका वेग, दुःसह श्रोत्रेन्द्रियका वेग, घृणा, अपनी प्रशंसाके लिये बढ़-बढ़कर बातें बनाना, मत्सरता, पाप, दुष्कर कर्मोंमें प्रवृत्ति, न करने योग्य कार्य कर बैठना—इन सबका कारण भी लोभ ही है ।। ८—१० ½ ।।

जातौ बाल्ये च कौमारे यौवने चापि मानवाः ।। ११ ।।
न संत्यजन्त्यात्मकर्म यो न जीर्यति जीर्यतः ।
यो न पूरयितुं शक्यो लोभः प्राप्त्या कुरूद्वह ।। १२ ।।
नित्यं गम्भीरतोयाभिरापगाभिरिवोदधिः ।
कुरुश्रेष्ठ! मनुष्य जन्मकालमें, बाल्यावस्थामें तथा कौमार और यौवनावस्थामें जिसके कारण अपने बुरे कर्मोंको छोड़ नहीं पाते हैं, जो मनुष्यके वृद्ध होनेपर भी जीर्ण नहीं होता, वह लोभ ही है। जिस प्रकार गहरे जलवाली बहुत-सी नदियोंके मिल जानेसे भी समुद्र नहीं भरता है, उसी प्रकार कितने ही पदार्थोंका लाभ क्यों न हो जाय, लोभका पेट कभी नहीं भरता है ।। ११-१२ ½ ।।

न प्रहृष्यति यो लाभैः कामैर्यश्च न तृप्यति ।। १३ ।।
यो न देवैर्न गन्धर्वैर्नासुरैर्न महोरगैः ।
ज्ञायते नृप तत्त्वेन सर्वैर्भूतगणैस्तथा ।। १४ ।।
लोभी मनुष्य बहुत-सा लाभ पाकर भी संतुष्ट नहीं होता। भोगोंसे वह कभी तृप्त नहीं होता। नरेश्वर! न देवताओं, न गन्धर्वों, न असुरों, न बड़े-बड़े नागों और न सम्पूर्ण भूतगणोंद्वारा ही लोभका स्वरूप यथार्थ-रूपसे जाना जाता है ।। १३-१४ ।।

स लोभः सह मोहेन विजेतव्यो जितात्मना ।
दम्भो द्रोहश्च निन्दा च पैशुन्यं मत्सरस्तथा ।। १५ ।।

भवन्त्येतानि कौरव्य लुब्धानामकृतात्मनाम् । जिसने अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें कर लिया है, उस पुरुषको चाहिये कि वह मोहसहित लोभको जीते। कुरुनन्दन! दम्भ, द्रोह, निन्दा, चुगली, और मत्सरता—ये सभी दोष अजितात्मा लोभी पुरुषोंमें ही होते हैं ।। १५ १/२ ।।

सुमहान्त्यपि शास्त्राणि धारयन्ति बहुश्रुताः ।। १६ ।। छेत्तारः संशयानां च क्लिश्यन्तीहाल्पबुद्धयः । बहुश्रुत विद्वान् बड़े-बड़े शास्त्रोंको कण्ठस्थ कर लेते हैं। सबकी शंकाओंका निवारण कर देते हैं; परंतु इस लोभमें फँसकर उनकी बुद्धि मारी जाती है और वे निरन्तर क्लेश उठाते रहते हैं ।। १६ १/२ ।।

द्वेषक्रोधप्रसक्ताश्च शिष्टाचारबहिष्कृताः ।। १७ ।। अन्तःक्रूरा वाङ्मधुराः कूपाश्छन्नास्तृणैरिव । धर्मवैतंसिकाः क्षुद्रा मुष्णन्ति ध्वजिनो जगत् ।। १८ ।। वे दोष और क्रोधमें फँसकर शिष्टाचारको छोड़ देते हैं और ऊपरसे मीठे वचन बोलते हुए भी भीतरसे अत्यन्त कठोर हो जाते हैं। उनकी स्थिति घास-फूँससे ढके हुए कुएँके समान होती है। वे धर्मके नामपर संसारको धोखा देनेवाले क्षुद्र मनुष्य धर्मध्वजी होकर (धर्मका ढोंग फैलाकर) जगत्को लूटते हैं ।। १७-१८ ।।

कुर्वते च बहून् मार्गांस्तान् हेतुबलमाश्रिताः । सतां मार्गान् विलुम्पन्ति लोभाज्ञानेषु निष्ठिताः ।। १९ ।। युक्तिबलका आश्रय लेकर बहुत-से असत् मार्ग खड़े कर देते हैं तथा लोभ और अज्ञानमें स्थित हो सत्पुरुषोंके स्थापित किये हुए मार्गों (धर्ममर्यादाओं) का नाश करने लगते हैं ।। १९ ।।

धर्मस्य ह्रियमाणस्य लोभग्रस्तैर्दुरात्मभिः । या या विक्रियते संस्था ततः सापि प्रपद्यते ।। २० ।। लोभग्रस्त दुरात्मा पुरुषोंद्वारा अपहृत (विकृत) होनेवाले धर्मकी जो-जो स्थिति बिगड़ जाती या बदल जाती है, वह उसी रूपमें प्रचलित हो जाती है ।। २० ।।

दर्पः क्रोधो मदः स्वप्नो हर्षः शोकोऽतिमानिता । एत एव हि कौरव्य दृश्यन्ते लुब्धबुद्धिषु ।। २१ ।। कुरुनन्दन! जिनकी बुद्धि लोभमें फँसी हुई है, उन मनुष्योंमें दर्प, क्रोध, मद, दुःस्वप्न, हर्ष, शोक तथा अत्यन्त अभिमान—ये ही दोष दिखायी देते हैं ।। २१ ।।

एतानशिष्टान् बुध्यस्व नित्यं लोभसमन्वितान् । शिष्टांस्तु परिपृच्छेथा यान् वक्ष्यामि शुचिव्रतान् ।। २२ ।। जो सदा लोभमें डूबे रहते हैं, ऐसे ही मनुष्योंको तुम अशिष्ट समझो। तुम्हें शिष्ट पुरुषोंसे ही अपनी शंकाएँ पूछनी चाहिये। पवित्र नियमोंका पालन करनेवाले उन शिष्ट पुरुषोंका मैं

परिचय दे रहा हूँ ॥ २२ ॥ येष्वावृत्तिभयं नास्ति परलोकभयं न च । नामिषेषु प्रसंगोऽस्ति न प्रियेष्वप्रियेषु च ॥ २३ ॥ जिन्हें फिर संसारमें जन्म लेनेका भय नहीं है, परलोकसे भी भय नहीं है, जिनकी भोगोंमें आसक्ति नहीं है तथा प्रिय और अप्रियमें भी जिनका राग-द्वेष नहीं है ॥ २३ ॥ शिष्टाचारः प्रियो येषु दमो येषु प्रतिष्ठितः । सुखं दुःखं समं येषां सत्यं येषां परायणम् ॥ २४ ॥ जिन्हें शिष्टाचार प्रिय है। जिनमें इन्द्रिय-संयम प्रतिष्ठित है। जिनके लिये सुख और दुःख समान है। सत्य ही जिनका परम आश्रय है ॥ २४ ॥ दातारो न ग्रहीतारो दयावन्तस्तथैव च । पितृदेवातिथेयाश्च नित्योद्युक्तास्तथैव च ॥ २५ ॥ वे देते हैं, लेते नहीं। उनमें स्वभावसे ही दया भरी रहती है। वे देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंके सेवक होते हैं और सत्कर्म करनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं ॥ २५ ॥ सर्वोपकारिणो वीराः सर्वधर्मानुपालकाः । सर्वभूतहिताश्चैव सर्वदयाश्च भारत ॥ २६ ॥ भरतनन्दन! वे वीर पुरुष सबका उपकार करनेवाले, सम्पूर्ण धर्मोंके रक्षक तथा समस्त प्राणियोंके हितैषी होते हैं। वे परहितके लिये सर्वस्व निछावर कर देते हैं ॥ २६ ॥ न ते चालयितुं शक्या धर्मव्यापारकारिणः । न तेषां भिद्यते वृत्तं यत्पुरा साधुभिः कृतम् ॥ २७ ॥ उन्हें सत्कर्मसे विचलित नहीं किया जा सकता। वे केवल धर्मके अनुष्ठानमें तत्पर रहते हैं। पहलेके श्रेष्ठ पुरुषोंने जिसका पालन किया है, उसी सदाचारका वे भी पालन करते हैं। उनका वह आचार कभी नष्ट नहीं होता ॥ २७ ॥ न त्रासिनो न चपला न रौद्राः सत्यथे स्थिताः । ते सेव्याः साधुभिर्नित्यं येष्वहिंसा प्रतिष्ठिता ॥ २८ ॥ वे किसीको भय नहीं दिखाते, चपलता नहीं करते उनका स्वभाव किसीके लिये भयंकर नहीं होता है, वे सदा सन्मार्गमें ही स्थित रहते हैं, उनमें अहिंसा नित्य प्रतिष्ठित होती है, ऐसे श्रेष्ठ पुरुषोंका ही सदा सेवन करना चाहिये ॥ २८ ॥ कामक्रोधव्यपेता ये निर्ममा निरहंकृताः । सुव्रताः स्थिरमर्यादास्तानुपास्व च पृच्छ च ॥ २९ ॥ जो काम और क्रोधसे रहित, ममता और अहंकारसे शून्य, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा धर्ममर्यादाको स्थिर रखनेवाले हैं, उन्हीं महापुरुषोंका संग करो और उनसे अपना संदेह पूछो ॥ २९ ॥ न धनार्थं यशोऽर्थं वा धर्मस्तेषां युधिष्ठिर ।

अवश्यं कार्य इत्येव शरीरस्य क्रियास्तथा ॥ ३० ॥
युधिष्ठिर! उनका धर्मपालन धन बटोरने या यश कमानेके लिये नहीं होता। वे धर्म तथा शारीरिक क्रियाओंको आवश्यकर्तव्य समझकर ही करते हैं ॥ ३० ॥
न भयं क्रोधचापत्ये न शोकस्तेषु विद्यते ।
न धर्मध्वजिनश्चैव न गुह्यं कञ्चिदास्थिताः ॥ ३१ ॥
उनमें भय, क्रोध, चपलता तथा शोक नहीं होता। वे धर्मध्वजी (पाखण्डी) नहीं होते, किसी गोपनीय पाखण्डपूर्ण धर्मका आश्रय नहीं लेते हैं ॥ ३१ ॥
येष्वलोभस्तथामोहो ये च सत्यार्जवे स्थिताः ।
तेषु कौन्तेय रज्येथा येषां न भ्रश्यते पुनः ॥ ३२ ॥
कुन्तीनन्दन! जिनमें लोभ और मोहका अभाव है, जो सत्य और सरलतामें स्थित हैं तथा कभी सदाचारसे भ्रष्ट नहीं होते हैं, ऐसे पुरुषोंमें तुम्हें प्रेम रखना चाहिये ॥ ३२ ॥
ये न हृष्यन्ति लाभेषु नालाभेषु व्यथन्ति च ।
निर्ममा निरहंकाराः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः ॥ ३३ ॥
लाभालाभौ सुखदुःखे च तात
प्रियाप्रिये मरणं जीवितं च ।
समानि येषां स्थिरविक्रमाणां
बुभुत्सतां सत्त्वपथे स्थितानाम् ॥ ३४ ॥
धर्मप्रियांस्तान् सुमहानुभावान्
दान्तोऽप्रमत्तश्च समर्च्चयेथाः ।
दैवात् सर्वे गुणवन्तो भवन्ति
शुभाशुभे वाक्प्रलापास्त्वन्ये ॥ ३५ ॥
तात! जो लाभमें हर्षसे फूल नहीं उठते, हानिमें व्यथित नहीं होते, ममता और अहंकारसे शून्य हैं, जो सर्वदा सत्त्वगुणमें स्थित और समदर्शी होते हैं, जिनकी दृष्टिमें लाभ-हानि सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय तथा जीवन-मरण समान हैं, जो सुदृढ़ पराक्रमी, आध्यात्मिक उन्नतिके इच्छुक और सत्त्वमय मार्गमें स्थित हैं, उन धर्मप्रेमी महानुभावोंकी तुम सावधान और जितेन्द्रिय रहकर सेवा-सत्कार करो। ये सब महापुरुष स्वभावसे ही बड़े गुणवान् होते हैं। शुभ और अशुभके विषयमें उनकी वाणी यथार्थ होती है। दूसरे लोग तो केवल बातें बनानेवाले होते हैं ॥ ३३-३५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि आपन्मूलभूतदोषकथने
अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें आपत्तिके मूलभूत दोषका वर्णनविषयक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५८ ॥

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युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! आपने सब अनर्थोंके आधारभूत लोभका वर्णन तो किया, अब अज्ञानका भी यथार्थरूपसे वर्णन कीजिये; मैं उसके परिणामको भी सुनना चाहता हूँ

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एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

अज्ञान और लोभको एक दूसरेका कारण बताकर दोनोंकी एकता करना और दोनोंको ही समस्त दोषोंका कारण सिद्ध करना

युधिष्ठिर उवाच

अनर्थानामधिष्ठानमुक्तो लोभः पितामह ।
अज्ञानमपि वै तात श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! आपने सब अनर्थोंके आधारभूत लोभका वर्णन तो किया, अब अज्ञानका भी यथार्थरूपसे वर्णन कीजिये; मैं उसके परिणामको भी सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

करोति पापं योऽज्ञानान्नात्मनो वेत्ति च क्षयम् ।
प्रद्वेष्टि साधुवृत्तांश्च स लोकस्यैति वाच्यताम् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो मनुष्य अज्ञानवश पाप करता है और उससे होनेवाली अपनी ही हानिको नहीं समझता तथा श्रेष्ठ पुरुषोंसे द्वेष करता है, उसकी संसारमें बड़ी निन्दा होती है ॥ २ ॥
अज्ञानान्निरयं याति तथाज्ञानेन दुर्गतिम् ।
अज्ञानात् क्लेशमाप्नोति तथापत्सु निमज्जति ॥ ३ ॥
अज्ञानसे ही जीव नरकमें पड़ता है। अज्ञानसे ही उसकी दुर्गति होती है, अज्ञानसे वह कष्ट उठाता तथा विपत्तियोंके समुद्रमें डूब जाता है ॥ ३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अज्ञानस्य प्रवृत्तिं च स्थानं वृद्धिक्षयोदयौ ।
मूलं योगं गतिं कालं कारणं हेतुमेव च ॥ ४ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भूपाल! अज्ञानकी उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि, क्षय, उद्गम, मूल, योग, गति, काल, कारण और हेतु क्या हैं? ॥ ४ ॥
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन यथावदिह पार्थिव ।
अज्ञानप्रसवं हीदं यद् दुःखमुपलभ्यते ॥ ५ ॥
पृथ्वीनाथ! मैं इस विषयको यथावत्रूपसे तत्त्वके विवेचनपूर्वक सुनना चाहता हूँ; क्योंकि यह जो दुःख उपलब्ध होता है, उसकी उत्पत्तिका कारण अज्ञान ही है ॥ ५ ॥