भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1037, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1037

परिचय दे रहा हूँ ॥ २२ ॥ येष्वावृत्तिभयं नास्ति परलोकभयं न च । नामिषेषु प्रसंगोऽस्ति न प्रियेष्वप्रियेषु च ॥ २३ ॥ जिन्हें फिर संसारमें जन्म लेनेका भय नहीं है, परलोकसे भी भय नहीं है, जिनकी भोगोंमें आसक्ति नहीं है तथा प्रिय और अप्रियमें भी जिनका राग-द्वेष नहीं है ॥ २३ ॥ शिष्टाचारः प्रियो येषु दमो येषु प्रतिष्ठितः । सुखं दुःखं समं येषां सत्यं येषां परायणम् ॥ २४ ॥ जिन्हें शिष्टाचार प्रिय है। जिनमें इन्द्रिय-संयम प्रतिष्ठित है। जिनके लिये सुख और दुःख समान है। सत्य ही जिनका परम आश्रय है ॥ २४ ॥ दातारो न ग्रहीतारो दयावन्तस्तथैव च । पितृदेवातिथेयाश्च नित्योद्युक्तास्तथैव च ॥ २५ ॥ वे देते हैं, लेते नहीं। उनमें स्वभावसे ही दया भरी रहती है। वे देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंके सेवक होते हैं और सत्कर्म करनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं ॥ २५ ॥ सर्वोपकारिणो वीराः सर्वधर्मानुपालकाः । सर्वभूतहिताश्चैव सर्वदयाश्च भारत ॥ २६ ॥ भरतनन्दन! वे वीर पुरुष सबका उपकार करनेवाले, सम्पूर्ण धर्मोंके रक्षक तथा समस्त प्राणियोंके हितैषी होते हैं। वे परहितके लिये सर्वस्व निछावर कर देते हैं ॥ २६ ॥ न ते चालयितुं शक्या धर्मव्यापारकारिणः । न तेषां भिद्यते वृत्तं यत्पुरा साधुभिः कृतम् ॥ २७ ॥ उन्हें सत्कर्मसे विचलित नहीं किया जा सकता। वे केवल धर्मके अनुष्ठानमें तत्पर रहते हैं। पहलेके श्रेष्ठ पुरुषोंने जिसका पालन किया है, उसी सदाचारका वे भी पालन करते हैं। उनका वह आचार कभी नष्ट नहीं होता ॥ २७ ॥ न त्रासिनो न चपला न रौद्राः सत्यथे स्थिताः । ते सेव्याः साधुभिर्नित्यं येष्वहिंसा प्रतिष्ठिता ॥ २८ ॥ वे किसीको भय नहीं दिखाते, चपलता नहीं करते उनका स्वभाव किसीके लिये भयंकर नहीं होता है, वे सदा सन्मार्गमें ही स्थित रहते हैं, उनमें अहिंसा नित्य प्रतिष्ठित होती है, ऐसे श्रेष्ठ पुरुषोंका ही सदा सेवन करना चाहिये ॥ २८ ॥ कामक्रोधव्यपेता ये निर्ममा निरहंकृताः । सुव्रताः स्थिरमर्यादास्तानुपास्व च पृच्छ च ॥ २९ ॥ जो काम और क्रोधसे रहित, ममता और अहंकारसे शून्य, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा धर्ममर्यादाको स्थिर रखनेवाले हैं, उन्हीं महापुरुषोंका संग करो और उनसे अपना संदेह पूछो ॥ २९ ॥ न धनार्थं यशोऽर्थं वा धर्मस्तेषां युधिष्ठिर ।