भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1038, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1038

अवश्यं कार्य इत्येव शरीरस्य क्रियास्तथा ॥ ३० ॥
युधिष्ठिर! उनका धर्मपालन धन बटोरने या यश कमानेके लिये नहीं होता। वे धर्म तथा शारीरिक क्रियाओंको आवश्यकर्तव्य समझकर ही करते हैं ॥ ३० ॥
न भयं क्रोधचापत्ये न शोकस्तेषु विद्यते ।
न धर्मध्वजिनश्चैव न गुह्यं कञ्चिदास्थिताः ॥ ३१ ॥
उनमें भय, क्रोध, चपलता तथा शोक नहीं होता। वे धर्मध्वजी (पाखण्डी) नहीं होते, किसी गोपनीय पाखण्डपूर्ण धर्मका आश्रय नहीं लेते हैं ॥ ३१ ॥
येष्वलोभस्तथामोहो ये च सत्यार्जवे स्थिताः ।
तेषु कौन्तेय रज्येथा येषां न भ्रश्यते पुनः ॥ ३२ ॥
कुन्तीनन्दन! जिनमें लोभ और मोहका अभाव है, जो सत्य और सरलतामें स्थित हैं तथा कभी सदाचारसे भ्रष्ट नहीं होते हैं, ऐसे पुरुषोंमें तुम्हें प्रेम रखना चाहिये ॥ ३२ ॥
ये न हृष्यन्ति लाभेषु नालाभेषु व्यथन्ति च ।
निर्ममा निरहंकाराः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः ॥ ३३ ॥
लाभालाभौ सुखदुःखे च तात
प्रियाप्रिये मरणं जीवितं च ।
समानि येषां स्थिरविक्रमाणां
बुभुत्सतां सत्त्वपथे स्थितानाम् ॥ ३४ ॥
धर्मप्रियांस्तान् सुमहानुभावान्
दान्तोऽप्रमत्तश्च समर्च्चयेथाः ।
दैवात् सर्वे गुणवन्तो भवन्ति
शुभाशुभे वाक्प्रलापास्त्वन्ये ॥ ३५ ॥
तात! जो लाभमें हर्षसे फूल नहीं उठते, हानिमें व्यथित नहीं होते, ममता और अहंकारसे शून्य हैं, जो सर्वदा सत्त्वगुणमें स्थित और समदर्शी होते हैं, जिनकी दृष्टिमें लाभ-हानि सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय तथा जीवन-मरण समान हैं, जो सुदृढ़ पराक्रमी, आध्यात्मिक उन्नतिके इच्छुक और सत्त्वमय मार्गमें स्थित हैं, उन धर्मप्रेमी महानुभावोंकी तुम सावधान और जितेन्द्रिय रहकर सेवा-सत्कार करो। ये सब महापुरुष स्वभावसे ही बड़े गुणवान् होते हैं। शुभ और अशुभके विषयमें उनकी वाणी यथार्थ होती है। दूसरे लोग तो केवल बातें बनानेवाले होते हैं ॥ ३३-३५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि आपन्मूलभूतदोषकथने
अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें आपत्तिके मूलभूत दोषका वर्णनविषयक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५८ ॥

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