महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभवन्त्येतानि कौरव्य लुब्धानामकृतात्मनाम् । जिसने अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें कर लिया है, उस पुरुषको चाहिये कि वह मोहसहित लोभको जीते। कुरुनन्दन! दम्भ, द्रोह, निन्दा, चुगली, और मत्सरता—ये सभी दोष अजितात्मा लोभी पुरुषोंमें ही होते हैं ।। १५ १/२ ।।
सुमहान्त्यपि शास्त्राणि धारयन्ति बहुश्रुताः ।। १६ ।। छेत्तारः संशयानां च क्लिश्यन्तीहाल्पबुद्धयः । बहुश्रुत विद्वान् बड़े-बड़े शास्त्रोंको कण्ठस्थ कर लेते हैं। सबकी शंकाओंका निवारण कर देते हैं; परंतु इस लोभमें फँसकर उनकी बुद्धि मारी जाती है और वे निरन्तर क्लेश उठाते रहते हैं ।। १६ १/२ ।।
द्वेषक्रोधप्रसक्ताश्च शिष्टाचारबहिष्कृताः ।। १७ ।। अन्तःक्रूरा वाङ्मधुराः कूपाश्छन्नास्तृणैरिव । धर्मवैतंसिकाः क्षुद्रा मुष्णन्ति ध्वजिनो जगत् ।। १८ ।। वे दोष और क्रोधमें फँसकर शिष्टाचारको छोड़ देते हैं और ऊपरसे मीठे वचन बोलते हुए भी भीतरसे अत्यन्त कठोर हो जाते हैं। उनकी स्थिति घास-फूँससे ढके हुए कुएँके समान होती है। वे धर्मके नामपर संसारको धोखा देनेवाले क्षुद्र मनुष्य धर्मध्वजी होकर (धर्मका ढोंग फैलाकर) जगत्को लूटते हैं ।। १७-१८ ।।
कुर्वते च बहून् मार्गांस्तान् हेतुबलमाश्रिताः । सतां मार्गान् विलुम्पन्ति लोभाज्ञानेषु निष्ठिताः ।। १९ ।। युक्तिबलका आश्रय लेकर बहुत-से असत् मार्ग खड़े कर देते हैं तथा लोभ और अज्ञानमें स्थित हो सत्पुरुषोंके स्थापित किये हुए मार्गों (धर्ममर्यादाओं) का नाश करने लगते हैं ।। १९ ।।
धर्मस्य ह्रियमाणस्य लोभग्रस्तैर्दुरात्मभिः । या या विक्रियते संस्था ततः सापि प्रपद्यते ।। २० ।। लोभग्रस्त दुरात्मा पुरुषोंद्वारा अपहृत (विकृत) होनेवाले धर्मकी जो-जो स्थिति बिगड़ जाती या बदल जाती है, वह उसी रूपमें प्रचलित हो जाती है ।। २० ।।
दर्पः क्रोधो मदः स्वप्नो हर्षः शोकोऽतिमानिता । एत एव हि कौरव्य दृश्यन्ते लुब्धबुद्धिषु ।। २१ ।। कुरुनन्दन! जिनकी बुद्धि लोभमें फँसी हुई है, उन मनुष्योंमें दर्प, क्रोध, मद, दुःस्वप्न, हर्ष, शोक तथा अत्यन्त अभिमान—ये ही दोष दिखायी देते हैं ।। २१ ।।
एतानशिष्टान् बुध्यस्व नित्यं लोभसमन्वितान् । शिष्टांस्तु परिपृच्छेथा यान् वक्ष्यामि शुचिव्रतान् ।। २२ ।। जो सदा लोभमें डूबे रहते हैं, ऐसे ही मनुष्योंको तुम अशिष्ट समझो। तुम्हें शिष्ट पुरुषोंसे ही अपनी शंकाएँ पूछनी चाहिये। पवित्र नियमोंका पालन करनेवाले उन शिष्ट पुरुषोंका मैं