भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1035

लोभसे ही कृपणता, अत्यन्त तृष्णा, शास्त्रविरुद्ध कर्मोंमें प्रवृत्ति, कुल और विद्याविषयक अभिमान, रूप और ऐश्वर्यका मद, समस्त प्राणियोंके प्रति द्रोह, सबका तिरस्कार, सबके प्रति अविश्वास तथा कुटिलतापूर्ण बर्ताव होते हैं ।। ६-७ ।।

हरणं परवित्तानां परदाराभिमर्शनम् ।
वाग्वेगो मनसो वेगो निन्दावेगस्तथैव च ।। ८ ।।
उपस्थोदरयोर्वेगो मृत्युवेगश्च दारुणः ।
ईर्ष्यावेगश्च बलवान् मिथ्यावेगश्च दुर्जयः ।। ९ ।।
रसवेगश्च दुर्वार्यः श्रोत्रवेगश्च दुःसहः ।
कुत्सा विकत्था मात्सर्यं पापं दुष्करकारिता ।। १० ।।
साहसानां च सर्वेषामकार्याणां क्रियास्तथा ।
पराये धनका अपहरण, परायी स्त्रियोंके प्रति बलात्कार, वाणीका वेग, मनका वेग, निन्दा करनेकी विशेष प्रवृत्ति, जननेन्द्रियका वेग, उदरका वेग, मृत्युका भयंकर वेग अर्थात् आत्महत्या, ईर्ष्याका प्रबल वेग, मिथ्या का दुर्जय वेग, अनिवार्य रसनेन्द्रियका वेग, दुःसह श्रोत्रेन्द्रियका वेग, घृणा, अपनी प्रशंसाके लिये बढ़-बढ़कर बातें बनाना, मत्सरता, पाप, दुष्कर कर्मोंमें प्रवृत्ति, न करने योग्य कार्य कर बैठना—इन सबका कारण भी लोभ ही है ।। ८—१० ½ ।।

जातौ बाल्ये च कौमारे यौवने चापि मानवाः ।। ११ ।।
न संत्यजन्त्यात्मकर्म यो न जीर्यति जीर्यतः ।
यो न पूरयितुं शक्यो लोभः प्राप्त्या कुरूद्वह ।। १२ ।।
नित्यं गम्भीरतोयाभिरापगाभिरिवोदधिः ।
कुरुश्रेष्ठ! मनुष्य जन्मकालमें, बाल्यावस्थामें तथा कौमार और यौवनावस्थामें जिसके कारण अपने बुरे कर्मोंको छोड़ नहीं पाते हैं, जो मनुष्यके वृद्ध होनेपर भी जीर्ण नहीं होता, वह लोभ ही है। जिस प्रकार गहरे जलवाली बहुत-सी नदियोंके मिल जानेसे भी समुद्र नहीं भरता है, उसी प्रकार कितने ही पदार्थोंका लाभ क्यों न हो जाय, लोभका पेट कभी नहीं भरता है ।। ११-१२ ½ ।।

न प्रहृष्यति यो लाभैः कामैर्यश्च न तृप्यति ।। १३ ।।
यो न देवैर्न गन्धर्वैर्नासुरैर्न महोरगैः ।
ज्ञायते नृप तत्त्वेन सर्वैर्भूतगणैस्तथा ।। १४ ।।
लोभी मनुष्य बहुत-सा लाभ पाकर भी संतुष्ट नहीं होता। भोगोंसे वह कभी तृप्त नहीं होता। नरेश्वर! न देवताओं, न गन्धर्वों, न असुरों, न बड़े-बड़े नागों और न सम्पूर्ण भूतगणोंद्वारा ही लोभका स्वरूप यथार्थ-रूपसे जाना जाता है ।। १३-१४ ।।

स लोभः सह मोहेन विजेतव्यो जितात्मना ।
दम्भो द्रोहश्च निन्दा च पैशुन्यं मत्सरस्तथा ।। १५ ।।