भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1044, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1044

महर्षियोंने अपने-अपने ज्ञानके अनुसार धर्मकी एक नहीं, अनेक विधियाँ बतायी हैं, परंतु उन सबका आधार दम (मन और इन्द्रियोंका संयम) ही है ॥ ६ ॥ दमं निःश्रेयसं प्राहुर्वृद्धा निश्चितदर्शिनः । ब्राह्मणस्य विशेषेण दमो धर्मः सनातनः ॥ ७ ॥ धर्मके सिद्धान्तको जाननेवाले वृद्ध पुरुष दमको निःश्रेयस (परम कल्याण) का साधन बताते हैं। विशेषतः ब्राह्मणके लिये तो दम ही सनातन धर्म है ॥ ७ ॥ दमात् तस्य क्रियासिद्धिर्यथावदुपलभ्यते । दमो दानं तथा यज्ञानधीतं चातिवर्तते ॥ ८ ॥ दमसे ही उसे अपने शुभ कर्मोंकी यथावत् सिद्धि प्राप्त होती है। दम उसके लिये दान, यज्ञ और स्वाध्यायसे भी बढ़कर है ॥ ८ ॥ दमस्तेजो वर्धयति पवित्रं च दमः परम् । विपाप्मा तेजसा युक्तः पुरुषो विन्दते महत् ॥ ९ ॥ दम तेजकी वृद्धि करता है, दम परम पवित्र साधन है, दमसे पापरहित हुआ तेजस्वी पुरुष परमपदको प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥ दमेन सदृशं धर्मं नान्यं लोकेषु शुश्रुम ॥ दमो हि परमो लोके प्रशस्तः सर्वधर्मिणाम् ॥ १० ॥ हमने संसारमें दमके समान दूसरा कोई धर्म नहीं सुना। जगत्में सभी धर्मवालोंके यहाँ दमको उत्कृष्ट बताया गया है। सबने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है ॥ १० ॥ प्रेत्य चात्र मनुष्येन्द्र परमं विन्दते सुखम् । दमेन हि समायुक्तो महान्तं धर्ममश्नुते ॥ ११ ॥ नरेन्द्र! दमसे अर्थात् इन्द्रिय और मनके संयमसे युक्त पुरुषको महान् धर्मकी प्राप्ति होती है। वह इहलोक और परलोकमें भी परम सुख पाता है ॥ ११ ॥ सुखं दान्तः प्रस्वपिति सुखं च प्रतिबुध्यते । सुखं पर्येति लोकांश्च मनश्चास्य प्रसीदति ॥ १२ ॥ जिसने अपने मन और इन्द्रियोंका दमन कर लिया है, वह सुखसे सोता, सुखसे ही जागता और सुखपूर्वक ही लोकोंमें विचरता है। उसका मन सदा प्रसन्न रहता है ॥ १२ ॥ अदान्तः पुरुषः क्लेशमभीक्ष्णं प्रतिपद्यते । अनर्थांश्च बहूनन्यान् प्रसृजत्यात्मदोषजान् ॥ १३ ॥ जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें नहीं है, वह पुरुष निरन्तर क्लेश उठाता है। साथ ही वह अपने ही दोषोंसे बहुत-से दूसरे-दूसरे अनर्थोंकी भी सृष्टि कर लेता है ॥ १३ ॥ आश्रमेषु चतुर्ष्वाहुर्दममेवोत्तमं व्रतम् । तस्य लिङ्गानि वक्ष्यामि येषां समुदायो दमः ॥ १४ ॥