महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1045, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंचारों आश्रमोंमें दमको ही उत्तम व्रत बताया गया है। अब मैं इन्द्रिय-दमन एवं मनोनिरग्रहके उन लक्षणोंको बताऊँगा, जिनका उदय होना ही दम कहा गया है ।। १४ ।। क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् । इन्द्रियाभिजयो दाक्ष्यं मार्दवं हीरचापलम् ।। १५ ।। अकार्पण्यमसंरम्भः संतोषः प्रियवादिता । अविहिंसानसूया चाप्येषां समुदयो दमः ।। १६ ।। क्षमा, धीरता, अहिंसा, समता, सत्यवादिता, सरलता, इन्द्रिय-विजय, दक्षता, कोमलता, लज्जा, स्थिरता, उदारता, क्रोधहीनता, संतोष, प्रिय वचन बोलनेका स्वभाव, किसी भी प्राणीको कष्ट न देना और दूसरोंके दोष न देखना—इन सद्गुणोंका उदय होना ही दम कहलाता है ।। १५-१६ ।। गुरुपूजा च कौरव्य दया भूतेष्वपैशुनम् । जनवादं मृषावादं स्तुतिनिन्दाविसर्जनम् ।। १७ ।। कामं क्रोधं च लोभं च दर्पं स्तम्भं विकत्थनम् । रोषमीर्ष्यामवमानं च नैव दान्तो निषेवते ।। १८ ।। कुरुनन्दन! जिसने मन और इन्द्रियोंका दमन कर लिया है, उसमें गुरुजनोंके प्रति आदरका भाव, समस्त प्राणियोंके प्रति दया और किसीकी भी चुगली न करनेकी प्रवृत्ति होती है। वह जनापवाद, असत्य भाषण, निन्दा-स्तुतिकी प्रवृत्ति, काम, क्रोध, लोभ, दर्प, जड़ता, डींग हाँकना, रोष, ईर्ष्या और दूसरोंका अपमान—इन दुर्गुणोंका कभी सेवन नहीं करता ।। १७-१८ ।। अनिन्दितो ह्यकामात्मा नाल्पेष्वर्थ्यनसूयकः । समुद्रकल्पः स नरो न कथंचन पूर्यते ।। १९ ।। इन्द्रिय और मनको वशमें रखनेवाले पुरुषकी कभी निन्दा नहीं होती। उसके मनमें कोई कामना नहीं होती। वह छोटी-छोटी वस्तुओंके लिये किसीके सामने हाथ नहीं फैलाता अथवा तुच्छ विषय-सुखोंकी अभिलाषा नहीं रखता, दूसरोंके दोष नहीं देखता। वह मनुष्य समुद्रके समान अगाध गाम्भीर्य धारण करता है। जैसे समुद्र अनन्त जलराशि पाकर भी भरता नहीं है, उसी प्रकार वह भी निरन्तर धर्मसंचयसे कभी तृप्त नहीं होता ।। १९ ।। अहं त्वयि मयि त्वं च मयि ते तेषु चाप्यहम् । पूर्वसम्बन्धिसंयोगं नैतद् दान्तो निषेवते ।। २० ।। ‘मैं तुमपर स्नेह रखता हूँ और तुम मुझपर। वे मुझमें अनुराग रखते हैं और मैं उनमें’ इस प्रकार पहलेके सम्बन्धियोंके सम्बन्धका जितेन्द्रिय पुरुष चिन्तन नहीं करता ।। २० ।। सर्वाग्राम्यास्तथाऽऽरण्या याश्च लोके प्रवृत्तयः । निन्दां चैव प्रशंसां च यो नाश्रयति मुच्यते ।। २१ ।।