महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1078, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपीड़ा देने लगे ॥ ३० ॥ न जग्मुः संविदं तैश्च दर्पादसुरसत्तमाः । अथ वै भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मर्षिभिरुपस्थितः ॥ ३१ ॥ तदा हिमवतः शृङ्गे सुरम्ये पद्मतारके । शतयोजनविस्तारे मणिरत्नचयाचिते ॥ ३२ ॥ वे असुरश्रेष्ठ घमण्डमें भरकर उन प्रजाओंके साथ बातचीत भी नहीं करते थे। तदनन्तर ब्रह्मर्षियोंसहित भगवान् ब्रह्मा हिमालयके सुरम्य शिखरपर उपस्थित हुए। वह इतना ऊँचा था कि आकाशके तारे उसपर विकसित कमलके समान जान पड़ते थे। उसका विस्तार सौ योजनका था। वह मणियों तथा रत्नसमूहोंसे व्याप्त था ॥ ३१-३२ ॥ तस्मिन् गिरिवरे पुत्र पुष्पितद्रुमकानने । तस्थौ स विबुधश्रेष्ठो ब्रह्मा लोकार्थसिद्धये ॥ ३३ ॥ बेटा नकुल! जहाँके वृक्ष और वन फूलोंसे भरे हुए थे, उस श्रेष्ठ पर्वतशिखरपर सुरश्रेष्ठ ब्रह्माजी सम्पूर्ण जगत्का कार्य सिद्ध करनेके लिये ठहर गये ॥ ३३ ॥ ततो वर्षसहस्रान्ते वितानमकरोत् प्रभुः । विधिना कल्पदृष्टेन यथावच्चोपपादितम् ॥ ३४ ॥ ऋषिभिर्यज्ञपटुभिर्यथावत् कर्मकर्तृभिः । समिद्भिः परिसंकीर्णं दीप्यमानैश्च पावकैः ॥ ३५ ॥ काञ्चनैर्यज्ञभाण्डैश्च भ्राजिष्णुभिरलंकृतम् । वृतं देवगणैश्चैव प्रवरैर्यज्ञमण्डलम् ॥ ३६ ॥ तथा ब्रह्मर्षिभिश्चैव सदस्यैरुपशोभितम् । तदनन्तर कई सहस्र वर्ष व्यतीत होनेपर भगवान् ब्रह्माने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार वहाँ एक यज्ञ आरम्भ किया। यज्ञकुशल महर्षियों तथा अन्य कार्यकर्ताओंने यथावत् विधिके अनुसार उस यज्ञका सम्पादन किया। वहाँ यज्ञवेदियोंपर समिधाएँ फैली हुई थीं। जगह-जगह अग्निदेव प्रज्वलित हो रहे थे। चमचमाते हुए सुवर्णनिर्मित यज्ञपात्र यज्ञमण्डपकी शोभा बढ़ाते थे। वह यज्ञमण्डल श्रेष्ठ देवताओं तथा सभासद् बने हुए महर्षियोंसे सुशोभित होता था ॥ ३४-३६ १/२ ॥ तत्र घोरतमं वृत्तमृषीणां मे परिश्रुतम् ॥ ३७ ॥ चन्द्रमा विमलं व्योम यथाभ्युदिततारकम् । विकीर्याग्निं तथा भूतमुत्थितं श्रूयते तदा ॥ ३८ ॥ उस समय वहाँ एक अत्यन्त भयंकर घटना घटित हुई, जिसे मैंने ऋषियोंके मुँहसे सुना था। जैसे ताराओंके उगनेपर निर्मल आकाशमें चन्द्रमाका उदय हो, उसी प्रकार उस यज्ञमण्डपमें अग्निको इधर-उधर बिखेरकर एक भयंकर भूत प्रकट हुआ, ऐसा सुना जाता है ॥ ३७-३८ ॥