महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1077, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंवसिष्ठगौतमागस्त्यास्तथा नारदपर्वतौ ॥ २३ ॥ ऋषयो वालखिल्याश्च प्रभासाः सिकतास्तथा । घृतपाः सोमवायव्या वैश्वानरमरीचिपाः ॥ २४ ॥ अकृष्टाश्चैव हंसाश्च ऋषयो वाग्नियोनयः । वानप्रस्थाः पृश्नयश्च स्थिता ब्रह्मानुशासने ॥ २५ ॥ भृगु, अत्रि और अङ्गिरा—ये सिद्ध मुनि, तपस्याके धनी काश्यपगण, वसिष्ठ, गौतम, अगस्त्य, देवर्षि नारद, पर्वत, वालखिल्य ऋषि, प्रभास, सिकत, घृतप (घी पीकर रहनेवाले), सोमप (सोमपान करनेवाले), वायव्य (वायु पीकर रहनेवाले), मरीचिप (सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले) और वैश्वानर तथा अकृष्ट (बिना जोते-बोये उत्पन्न हुए अन्नसे जीविका चलानेवाले), हंसमुनि (संन्यासी), अग्निसे उत्पन्न होनेवाले ऋषिगण, वानप्रस्थ और पृश्निगण—ये सभी महात्मा ब्रह्माजीकी आज्ञाके अधीन रहकर सनातनधर्मका पालन करने लगे ॥ २३-२५ ॥
दानवेन्द्रास्त्वतिक्रम्य तत् पितामहशासनम् । धर्मस्यापचयं चक्रुः क्रोधलोभसमन्विताः ॥ २६ ॥ परंतु दानवेश्वरोंने क्रोध और लोभसे युक्त हो ब्रह्माजीकी उस आज्ञाका उल्लंघन करके धर्मको हानि पहुँचाना आरम्भ किया ॥ २६ ॥
हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षो विरोचनः । शम्बरो विप्रचित्तिश्च विराधो नमुचिर्बलिः ॥ २७ ॥ एते चान्ये च बहवः सगणा दैत्यदानवाः । धर्मसेतुमतिक्रम्य रेमिरेऽधर्मनिश्चयाः ॥ २८ ॥ हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, विरोचन, शम्बर, विप्रचित्ति, विराध, नमुचि और बलि—ये तथा और भी बहुत-से दैत्य और दानव अपने दलके साथ धर्ममर्यादाका उल्लङ्घन करके अधर्म करनेका ही दृढ़ निश्चय लेकर आमोद-प्रमोदमें जीवन व्यतीत करने लगे ॥ २७-२८ ॥
सर्वे तुल्याभिजातीया यथा देवास्तथा वयम् । इत्येवं धर्ममास्थाय स्पर्धमानाः सुरर्षिभिः ॥ २९ ॥ वे सभी दैत्य कहते थे कि 'हम और देवता एक ही जातिके हैं; अतः जैसे देवता हैं वैसे हम हैं।' इस प्रकार जातीय धर्मका आश्रय लेकर दैत्यगण देवर्षियोंके साथ स्पर्धा रखने लगे ॥ २९ ॥
न प्रियं नाप्यनुक्रोशं चक्रुर्भूतेषु भारत । त्रीनुपायानतिक्रम्य दण्डेन रुरुधुः प्रजाः ॥ ३० ॥ भरतनन्दन! वे न तो प्राणियोंका प्रिय करते थे और न उनपर दयाभाव ही रखते थे। वे साम, दाम और भेद—इन तीनों उपायोंको लाँघकर केवल दण्डके द्वारा समस्त प्रजाओंको