महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 108, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंदण्डस्यैव भयादेके न खादन्ति परस्परम् । अन्धे तमसि मज्जेयुर्यदि दण्डो न पालयेत् ॥ ७ ॥ बहुत-से मनुष्य दण्डके ही भयसे एक-दूसरेको खा नहीं जाते हैं, यदि दण्ड रक्षा न करे तो सब लोग घोर अन्धकारमें डूब जायँ ॥ ७ ॥
यस्माददान्तान् दमयत्यशिष्टान् दण्डयत्यपि । दमनाद् दण्डनाच्चैव तस्माद् दण्डं विदुर्बुधाः ॥ ८ ॥ यह उद्दण्ड मनुष्योंका दमन करता और दुष्टोंको दण्ड देता है, अतः उस दमन और दण्डके कारण ही विद्वान् पुरुष इसे दण्ड कहते हैं ॥ ८ ॥
वाचा दण्डो ब्राह्मणानां क्षत्रियाणां भुजार्पणम् । दानदण्डाः स्मृता वैश्या निर्दण्डः शूद्र उच्यते ॥ ९ ॥ यदि ब्राह्मण अपराध करे तो वाणीसे उसको अपमानित करना ही उसका दण्ड है, क्षत्रियको भोजनमात्रके लिये वेतन देकर उससे काम लेना उसका दण्ड है, वैश्योंसे जुर्मानाके रूपमें धन वसूल करना उनका दण्ड है, परंतु शूद्र दण्डरहित कहा गया है। उससे सेवा लेनेके सिवा और कोई दण्ड उसके लिये नहीं है ॥ ९ ॥
असम्मोहाय मर्त्यानामर्थसंरक्षणाय च । मर्यादा स्थापिता लोके दण्डसंज्ञा विशाम्पते ॥ १० ॥ प्रजानाथ! मनुष्योंको प्रमादसे बचाने और उनके धनकी रक्षा करनेके लिये लोकमें जो मर्यादा स्थापित की गयी है, उसीका नाम दण्ड है ॥ १० ॥
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति सूद्यतः । प्रजास्तत्र न मुह्यन्ते नेता चेत् साधु पश्यति ॥ ११ ॥ दण्डनीयपर ऐसी जोरकी मार पड़ती है कि उसकी आँखोंके सामने अँधेरा छा जाता है; इसलिये दण्डको काला कहा गया है। दण्ड देनेवालेकी आँखें क्रोधसे लाल रहती हैं; इसलिये उसे लोहिताक्ष कहते हैं। ऐसा दण्ड जहाँ सर्वथा शासनके लिये उद्यत होकर विचरता रहता है और नेता या शासक अच्छी तरह अपराधोंपर दृष्टि रखता है, वहाँ प्रजा प्रमाद नहीं करती ॥ ११ ॥
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः । दण्डस्यैव भयादेते मनुष्या वर्त्मनि स्थिताः ॥ १२ ॥ ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी—ये सभी मनुष्य दण्डके ही भयसे अपने-अपने मार्गपर स्थिर रहते हैं ॥ १२ ॥
नाभीतो यजते राजन् नाभीतो दातुमिच्छति । नाभीतः पुरुषः कश्चित् समये स्थातुमिच्छति ॥ १३ ॥ राजन्! बिना भयके कोई यज्ञ नहीं करता है, बिना भयके कोई दान नहीं करना चाहता है, और दण्डका भय न हो तो कोई पुरुष मर्यादा या प्रतिज्ञाके पालनपर भी स्थिर नहीं