महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 109, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंरहना चाहता है ॥ १३ ॥ नाच्छित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दुष्करम् । नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम् ॥ १४ ॥ मछली मारनेवाले मल्लाहोंकी तरह दूसरोंके मर्मस्थानोंका उच्छेद और दुष्कर कर्म किये बिना तथा बहुसंख्यक प्राणियोंको मारे बिना कोई बड़ी भारी सम्पत्ति नहीं प्राप्त कर सकता ॥ १४ ॥ नाघ्नतः कीर्तिरस्तीह न वित्तं न पुनः प्रजाः । इन्द्रो वृत्रवधेनैव महेन्द्रः समपद्यत ॥ १५ ॥ जो दूसरोंका वध नहीं करता, उसे इस संसारमें न तो कीर्ति मिलती है, न धन प्राप्त होता है और न प्रजा ही उपलब्ध होती है। इन्द्र वृत्रासुरका वध करनेसे ही महेन्द्र हो गये ॥ १५ ॥ य एव देवा हन्तारस्तांल्लोकोऽर्चयते भृशम् । हन्ता रुद्रस्तथा स्कन्दः शक्रोऽग्निर्वरुणो यमः ॥ १६ ॥ हन्ता कालस्तथा वायुर्मृत्युर्वैश्रवणो रविः । वसवो मरुतः साध्या विश्वेदेवाश्च भारत ॥ १७ ॥ एतान् देवान् नमस्यन्ति प्रतापप्रणता जनाः । जो देवता दूसरोंका वध करनेवाले हैं, उन्हींकी संसार अधिक पूजा करता है। रुद्र, स्कन्द, इन्द्र, अग्नि, वरुण, यम, काल, वायु, मृत्यु, कुबेर, सूर्य, वसु, मरुद्गण, साध्य तथा विश्वेदेव—ये सब देवता दूसरोंका वध करते हैं; इनके प्रतापके सामने नतमस्तक होकर सब लोग इन्हें नमस्कार करते हैं ॥ १६-१७ १/२ ॥ न ब्रह्माणं न धातारं न पूषाणं कथंचन ॥ १८ ॥ मध्यस्थान् सर्वभूतेषु दान्तान् शमपरायणान् । यजन्ते मानवाः केचित् प्रशान्ताः सर्वकर्मसु ॥ १९ ॥ परंतु ब्रह्मा, धाता और पूषाकी कोई किसी तरह भी पूजा-अर्चा नहीं करते हैं; क्योंकि वे सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समभाव रखनेके कारण मध्यस्थ, जितेन्द्रिय एवं शान्तिपरायण हैं। जो शान्त स्वभावके मनुष्य हैं, वे ही समस्त कर्मोंमें इन धाता आदिकी पूजा करते हैं ॥ न हि पश्यामि जीवन्तं लोके कञ्चिदहिंसया । सत्त्वैः सत्त्वा हि जीवन्ति दुर्बलैर्बलवत्तराः ॥ २० ॥ संसारमें किसी भी ऐसे पुरुषको मैं नहीं देखता जो अहिंसासे जीविका चलाता हो। क्योंकि प्रबल जीव दुर्बल जीवोंद्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं ॥ २० ॥ नकुलो मूषिकानत्ति बिडालो नकुलं तथा । बिडालमत्ति श्वा राजन् श्वानं व्यालमृगस्तथा ॥ २१ ॥