भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 110

राजन्! नेवला चूहेको खा जाता है और नेवलेको बिलाव। बिलावको कुत्ता और कुत्तेको चीता चबा जाता है ॥ २१ ॥

तानत्ति पुरुषः सर्वान् पश्य कालो यथागतः ।
प्राणस्यान्नमिदं सर्वं जङ्गमं स्थावरं च यत् ॥ २२ ॥
परंतु इन सबको मनुष्य मारकर खा जाता है। देखो, कैसा काल आ गया है? यह सम्पूर्ण चराचर जगत् प्राणका अन्न है ॥ २२ ॥

विधानं दैवविहितं तत्र विद्वान् न मुह्यति ।
यथा सृष्टोऽसि राजेन्द्र तथा भवितुमर्हसि ॥ २३ ॥
यह सब दैवका विधान है। इसमें विद्वान् पुरुषको मोह नहीं होता है। राजेन्द्र! आपको विधाताने जैसा बनाया है, (जिस जाति और कुलमें आपको जन्म दिया है) वैसा ही आपको होना चाहिये ॥ २३ ॥

विनीतक्रोधहर्षा हि मन्दा वनमुपाश्रिताः ।
विना वधं न कुर्वन्ति तापसाः प्राणयापनम् ॥ २४ ॥
जिनमें क्रोध और हर्ष दोनों ही नहीं रह गये हैं, वे मन्दबुद्धि क्षत्रिय वनमें जाकर तपस्वी बन जाते हैं। परंतु बिना हिंसा किये वे भी जीवन-निर्वाह नहीं कर पाते हैं ॥ २४ ॥

उदके बहवः प्राणाः पृथिव्यां च फलेषु च ।
न च कश्चिन्न तान् हन्ति किमन्यत् प्राणयापनात् ॥ २५ ॥
जलमें बहुतेरे जीव हैं, पृथ्वीपर तथा वृक्षके फलोंमें भी बहुत-से कीड़े होते हैं। कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं है, जो इनमेंसे किसीको कभी न मारता हो। यह सब जीवन-निर्वाहके सिवा और क्या है? ॥ २५ ॥

सूक्ष्मयोनीनि भूतानि तर्कगम्यानि कानिचित् ।
पक्ष्मणोऽपि निपातेन येषां स्यात् स्कन्धपर्ययः ॥ २६ ॥
कितने ही ऐसे सूक्ष्म योनिके जीव हैं जो अनुमानसे ही जाने जाते हैं। मनुष्यकी पलकोंके गिरनेमात्रसे जिनके कंधे टूट जाते हैं (ऐसे जीवोंकी हिंसासे कोई कहाँ-तक बच सकता है?) ॥ २६ ॥

ग्रामान् निष्क्रम्य मुनयो विगतक्रोधमत्सराः ।
वने कुटुम्बर्धर्माणो दृश्यन्ते परिमोहिताः ॥ २७ ॥
कितने ही मुनि क्रोध और ईर्ष्यासे रहित हो गाँवसे निकलकर वनमें चले जाते हैं, और वहीं मोहवश गृहस्थधर्ममें अनुरक्त दिखायी देते हैं ॥ २७ ॥

भूमिं भित्त्वौषधीश्छित्त्वा वृक्षादीनण्डजान् पशून् ।
मनुष्यास्तन्वते यज्ञांस्ते स्वर्गं प्राप्नुवन्ति च ॥ २८ ॥
मनुष्य धरतीको खोदकर तथा ओषधियों, वृक्षों, लताओं, पक्षियों और पशुओंका उच्छेद करके यज्ञका अनुष्ठान करते हैं, और वे स्वर्गमें भी चले जाते हैं ॥