महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1080, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रगृह्यासिममेयात्मा रूपमन्यच्चकार ह । चतुर्बाहुः स्पृशन् मूर्ध्ना भूस्थितोऽपि दिवाकरम् ॥ ४७ ॥ उस समय महर्षिगण रुद्रदेवकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। तब अप्रमेयस्वरूप भगवान् रुद्रने वह तलवार लेकर एक-दूसरा चतुर्भुज रूप धारण किया जो भूतलपर खड़ा होकर भी अपने मस्तकसे सूर्यदेवका स्पर्श कर रहा था ॥ ४६-४७ ॥
ऊर्ध्वदृष्टिर्महालिङ्गो मुखाज्ज्वालाः समुत्सृजन् । विकुर्वन् बहुधा वर्णान् नीलपाण्डुरलोहितान् ॥ ४८ ॥ उसकी दृष्टि ऊपरकी ओर थी, वह महान् चिह्न धारण किये हुए था। मुखसे आगकी लपटें छोड़ रहा था और अपने अङ्गोंसे नील, श्वेत तथा लोहित (लाल) अनेक प्रकारके रंग प्रकट कर रहा था ॥ ४८ ॥
बिभ्रत्कृष्णाजिनं वासो हेमप्रवरतारकम् । नेत्रं चैकं ललाटेन भास्करप्रतिमं वहन् ॥ ४९ ॥ शुशुभातेऽतिविमले द्वे नेत्रे कृष्णपिङ्गले । उसने काले मृगचर्मको वस्त्रके रूपमें धारण कर रक्खा था, जिसमें सुवर्णनिर्मित तारे जड़े हुए थे। वह अपने ललाटमें सूर्यके समान एक तेजस्वी नेत्र धारण करता था। उसके सिवा काले और पिङ्गलवर्णके दो अत्यन्त निर्मल नेत्र और शोभा पा रहे थे ॥ ४९ १/२ ॥
ततो देवो महादेवः शूलपाणिर्भगाक्षिहा ॥ ५० ॥ सम्प्रगृह्य तु निस्त्रिंशं कालाग्निसमवर्चसम् । त्रिकूटं चर्म चोद्यम्य सविद्युतमिवाम्बुदम् । चचार विविधान् मार्गान् महाबलपराक्रमः ॥ ५१ ॥ विधुन्वन्नसिमाकाशे तथा युद्धचिकीर्षया । तदनन्तर भगदेवताके नेत्रोंका नाश करनेवाले महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न शूलपाणि भगवान् महादेव काल और अग्निके तुल्य तेजस्वी खड्गको तथा बिजलीसहित मेघके समान चमकीली तीन कोनोंवाली ढालको हाथमें लेकर भाँति-भाँतिके मार्गोंसे विचरने लगे; और युद्ध करनेकी इच्छासे वह तलवार आकाशमें घुमाने लगे ॥ ५०-५१ १/२ ॥
तस्य नादं विनदतो महाहासं च मुञ्चतः ॥ ५२ ॥ बभौ प्रतिभयं रूपं तदा रुद्रस्य भारत । भरतनन्दन! उस समय जोर-जोरसे गर्जते और महान् अट्टहास करते हुए रुद्रदेवका स्वरूप बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ ५२ १/२ ॥
तद्रूपधारिणं रुद्रं रौद्रकर्मचिकीर्षया ॥ ५३ ॥ निशम्य दानवाः सर्वे हृष्टाः समभिदुद्रुवुः । भयानक कर्म करनेकी इच्छासे वैसा ही रूप धारण करनेवाले रुद्रदेवको देखकर समस्त दानव हर्ष और उत्साहमें भरकर उनके ऊपर टूट पड़े ॥ ५३ १/२ ॥