भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1081

अश्मभिश्चाभ्यवर्षन्त प्रदीप्तैश्च तथोल्मुकैः ।। ५४ ।। घोरैः प्रहरणैश्चान्यैः क्षुरधारैरयोमयैः । कुछ लोग पत्थर बरसाने लगे, कुछ जलते लुआठे चलाने लगे, दूसरे भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंसे काम लेने लगे और कितने ही लोहनिर्मित छुरोंकी तीखी धारोंसे चोट करने लगे ।। ५४ ½ ।।

ततस्तु दानवानीकं सम्प्रणेतारमच्युतम् ।। ५५ ।। रुद्रं दृष्ट्वा बलोद्धूतं प्रमुमोह चचाल च । तत्पश्चात् दानवदलने देखा कि देवसेनापतिका कार्य सँभालनेवाले उत्कट बलशाली रुद्रदेव युद्धसे पीछे नहीं हट रहे हैं, तब वे मोहित और विचलित हो उठे ।। ५५ ½ ।।

चित्रं शीघ्रपदत्वाच्च चरन्तमसिपाणिनम् ।। ५६ ।। तमेकमसुराः सर्वे सहस्रमिति मेनिरे । शीघ्रतापूर्वक पैर उठानेके कारण विचित्र गतिसे विचरण करनेवाले एकमात्र खड्गधारी रुद्रदेवको वे सब असुर सहस्रोंके समान समझने लगे ।। ५६ ½ ।।

छिन्दन् भिन्दन् रुजन् कृन्तन् दारयन् पोथयन्नपि ।। ५७ ।। अचरद् वैरिसङ्घेषु दावाग्निरिव कक्षगः । जैसे सूखी लकड़ी और घास-फूँसमें लगा हुआ दावानल वनके समस्त वृक्षोंको जला देता है, उसी प्रकार भगवान् रुद्र शत्रुसमुदायमें दैत्योंको मारते-काटते, चीरते-फाड़ते, घायल करते, छेदते तथा विदीर्ण और धराशायी करते हुए विचरने लगे ।। ५७ ½ ।।

असिवेगप्रभग्नास्ते छिन्नबाहूरुवक्षसः ।। ५८ ।। सम्पर्कीर्णान्त्रगात्राश्च पेतुरुर्व्यां महाबलाः । तलवारके वेगसे उन सबमें भगदड़ मच गयी। कितनोंकी भुजाएँ और जाँघें कट गयीं। बहुतोंके वक्षःस्थल विदीर्ण हो गये और कितनोंके शरीरोंसे आँतें बाहर निकल आयीं। इस प्रकार वे महाबली दैत्य मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।। ५८ ½ ।।

अपरे दानवा भग्नाः खड्गपातावपीडिताः ।। ५९ ।। अन्योन्यमभिनर्दन्तो दिशः सम्प्रतिपेदिरे । दूसरे दानव तलवारकी चोटसे पीड़ित हो भाग खड़े हुए और एक-दूसरेको डाँट बताते हुए उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओंकी शरण ली ।। ५९ ½ ।।

भूमिं केचित् प्रविविशुः पर्वतानपरे तथा ।। ६० ।। अपरे जग्मुराकाशमपरेऽम्भः समाविशन् । कितने ही धरतीमें घुस गये, बहुत-से पर्वतोंमें छिप गये, कुछ आकाशमें उड़ चले और दूसरे बहुत-से दानव पानीमें समा गये ।। ६० ½ ।।

तस्मिन् महति संवृत्ते समरे भृशदारुणे ।। ६१ ।।