महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबभूव भूः प्रतिभया मांसशोणितकर्दमा ।
वह अत्यन्त दारुण महान् युद्ध आरम्भ होनेपर पृथ्वीपर रक्त और मांसकी कीच जम गयी। जिससे वह अत्यन्त भयंकर प्रतीत होने लगी ।। ६१ १/२ ।।
दानवानां शरीरैश्च पतितैः शोणितोक्षितैः ।। ६२ ।।
समाकीर्णा महाबाहो शैलैरिव सकिंशुकैः ।
महाबाहो! खूनसे लथपथ होकर गिरी हुई दानवोंकी लाशोंसे ढकी हुई यह भूमि पलाशके फूलोंसे युक्त पर्वत-शिखरोंद्वारा आच्छादित-सी जान पड़ती थी ।। ६२ १/२ ।।
स रुद्रो दानवान् हत्वा कृत्वा धर्मोत्तरं जगत् ।। ६३ ।।
रौद्रं रूपमथोत्क्षिप्य चक्रे रूपं शिवं शिवः ।
दानवोंका वध करके जगत्में धर्मकी प्रधानता स्थापित करनेके पश्चात् भगवान् रुद्रदेवने उस रौद्ररूपको त्याग दिया। फिर वे कल्याणकारी शिव अपने मङ्गलमय रूपसे सुशोभित होने लगे ।। ६३ १/२ ।।
ततो महर्षयः सर्वे सर्वे देवगणास्तथा ।। ६४ ।।
जयेनाद्भुतकल्पेन देवदेवं तथार्चयन् ।
तत्पश्चात् सम्पूर्ण महर्षियों और देवताओंने उस अद्भुत विजयसे संतुष्ट हो देवाधिदेव महादेवकी पूजा की ।।
ततः स भगवान् रुद्रो दानवक्षतजोक्षितम् ।। ६५ ।।
असिं धर्मस्य गोप्तारं ददौ सत्कृत्य विष्णवे ।
तदनन्तर भगवान् रुद्रने दानवोंके खूनसे रँगे हुए उस धर्मरक्षक खड्गको बड़े सत्कारके साथ भगवान् विष्णुके हाथमें दे दिया ।। ६५ १/२ ।।
विष्णुर्मरीचये प्रादान्मरीचिर्भगवानपि ।। ६६ ।।
महर्षिभ्यो ददौ खड्गमृषयो वासवाय च ।
भगवान् विष्णुने मरीचिको, मरीचिने महर्षियोंको और महर्षियोंने इन्द्रको वह खड्ग प्रदान किया ।। ६६ १/२ ।।
महेन्द्रो लोकपालेभ्यो लोकपालास्तु पुत्रक ।। ६७ ।।
मनवे सूर्यपुत्राय ददुः खड्गं सुविस्तरम् ।
बेटा! फिर महेन्द्रने लोकपालोंको और लोकपालोंने सूर्य-पुत्र मनुको वह विशाल खड्ग दे दिया ।। ६७ १/२ ।।
ऊचुश्चैनं तथा वाक्यं मानुषाणां त्वमीश्वरः ।। ६८ ।।
असिना धर्मगर्भेण पालयस्व प्रजा इति ।
तलवार देकर उन्होंने मनुसे कहा—'तुम मनुष्योंके शासक हो; अतः इस धर्मगर्भित खड्गसे प्रजाका पालन करो ।। ६८ १/२ ।।