भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1099, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1099

प्रभो! जो अपनी शक्तिके अनुसार कर्तव्यका ठीक-ठीक पालन करते और संतुष्ट रहते

हैं, जिन्हें बेमौके क्रोध नहीं आता, जो अकस्मात् स्नेहका त्याग नहीं करते, जो उदासीन हो

जानेपर भी मनसे कभी बुराई नहीं चाहते, अर्थके तत्त्वको समझते हैं और अपनेको कष्टमें

डालकर भी हितैषी पुरुषोंका कार्य सिद्ध करते हैं। जैसे रँगा हुआ ऊनी कपड़ा अपने रंग

नहीं छोड़ता, उसी प्रकार जो मित्रकी ओरसे विरक्त नहीं होते हैं, जो क्रोधवश मित्रका अनर्थ

करनेमें प्रवृत्त नहीं होते हैं तथा लोभ और मोहके वशीभूत हो मित्रकी युवतियोंपर अपनी

आसक्ति नहीं दिखाते, जो मित्रके विश्वासपात्र और धर्मके प्रति अनुरक्त हैं, जिनकी दृष्टिमें

मिट्टीका ढेला और सोना दोनों एक-से हैं, जो सदा सुहृदोंके प्रति सुस्थिर बुद्धि रखनेवाले हैं,

सबके लिये प्रमाणभूत शास्त्रोंके अनुसार चलते हैं और प्रारब्धवश प्राप्त हुए धनमें ही संतुष्ट

रहते हैं, जो कुटुम्बका संग्रह रखते हुए सदा अपने सुहृद् एवं स्वामीके कार्य-साधनमें तत्पर

रहते हैं—ऐसे श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ जो राजा संधि (मेल) करता है, उसका राज्य उसी तरह

बढ़ता है, जैसे चन्द्रमाकी चाँदनी ।। २०-२४ १/२ ।।

शास्त्रनित्या जितक्रोधा बलवन्तो रणे सदा ।। २५ ।।

जन्मशीलगुणोपेताः संधेयाः पुरुषोत्तमाः ।

जो प्रतिदिन शास्त्रोंका स्वाध्याय करते हैं, क्रोधको काबूमें रखते हैं और युद्धमें सदा

प्रबल रहते हैं। जिनका उत्तम कुलमें जन्म हुआ है, जो शीलवान् और श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हैं,

वे श्रेष्ठ पुरुष ही मित्र बनानेके योग्य होते हैं ।। २५ १/२ ।।

ये च दोषसमायुक्ता नराः प्रोक्ता मयानघ ।। २६ ।।

तेषामप्यधमा राजन् कृतघ्ना मित्रघातकाः ।

त्यक्तव्यास्तु दुराचाराः सर्वेषामिति निश्चयः ।। २७ ।।

निष्पाप नरेश! मैंने जो दोषयुक्त मनुष्य बताये हैं, उन सबमें अधम होते हैं कृतघ्न। वे

मित्रोंकी हत्यातक कर डालते हैं। ऐसे दुराचारी नराधमोंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये। यह

सबका निश्चय है ।। २६-२७ ।।

युधिष्ठिर उवाच

विस्तरेणाथ सम्बन्धं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।

मित्रद्रोही कृतघ्नश्च यः प्रोक्तस्तद् वदस्व मे ।। २८ ।।

युधिष्ठिरने कहा—पितामह! आपने जिसे मित्रद्रोही और कृतघ्न कहा है, उसका

यथार्थ इतिहास क्या है? यह मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ, आप कृपा करके मुझे

बताइये ।। २८ ।।

भीष्म उवाच

हन्त ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् ।

उदीच्यां दिशि यद् वृत्तं म्लेच्छेषु मनुजाधिप ।। २९ ।।

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