भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1100

**भीष्मजीने कहा—**नरेश्वर! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें एक पुराना इतिहास बता रहा हूँ। यह घटना उत्तरदिशामें म्लेच्छोंके देशमें घटित हुई थी॥ २९॥
ब्राह्मणो मध्यदेशीयः कश्चिद् वै ब्रह्मवर्जितः।
ग्रामं वृद्धियुतं वीक्ष्य प्राविशद् भैक्ष्यकांक्षया॥ ३०॥
मध्यदेशका एक ब्राह्मण, जिसने वेद बिलकुल नहीं पढ़ा था, कोई सम्पन्न गाँव देखकर उसमें भीख माँगनेके लिये गया॥ ३०॥
तत्र दस्युर्धनयुतः सर्ववर्णविशेषवित्।
ब्रह्मण्यः सत्यसंधश्च दाने च निरतोऽभवत्॥ ३१॥
उस गाँवमें एक धनी डाकू रहता था, जो समस्त वर्णोंकी विशेषताका जानकार था। उसके हृदयमें ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति थी। वह सत्यप्रतिज्ञ और दानी था॥ ३१॥
तस्य क्षयमुपागम्य ततो भिक्षामयाचत।
प्रतिश्रयं च वासार्थं भिक्षां चैवाथ वार्षिकीम्॥ ३२॥
प्रादात् तस्मै स विप्राय वस्त्रं च सदृशं नवम्।
नारीं चापि वयोपेतां भर्त्रा विरहितां तथा॥ ३३॥
ब्राह्मणने उसीके घर जाकर भिक्षाके लिये याचना की। दस्युने ब्राह्मणको रहनेके लिये एक घर देकर वर्षभर निर्वाह करनेके योग्य अन्नकी भिक्षाका प्रबन्ध कर दिया, उपयुक्त नया वस्त्र दिया और उसकी सेवामें एक युवती दासी भी दे दी, जो उस समय पतिसे रहित थी॥ ३२-३३॥
एतत् सम्प्राप्य हृष्टात्मा दस्योः सर्वं द्विजस्तथा।
तस्मिन् गृहवरे राजंस्तया रेमे स गौतमः॥ ३४॥
राजन्! दस्युसे ये सारी वस्तुएँ पाकर ब्राह्मण मन-ही-मन बड़ा प्रसन्न हुआ; और उस सुन्दर गृहमें दासीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा॥ ३४॥
कुटुम्बार्थं च दास्याश्च साहाय्यं चाप्यथाकरोत्।
तत्रावसत् स वर्षांश्च समृद्धे शबरालये॥ ३५॥
वह दासीके कुटुम्बके लिये कुछ सहायता भी करने लगा। ब्राह्मणने भीलके उस समृद्धिशाली भवनमें अनेक वर्षोंतक निवास किया॥ ३५॥
बाणवेधे परं यत्नमकरोच्चैव गौतमः।
चक्राङ्गानन् स च नित्यं वै सर्वतो वनगोचरान्॥ ३६॥
जघान गौतमो राजन् यथा दस्युगणास्तथा।
हिंसापटुर्धृणाहीनः सदा प्राणिवधे रतः॥ ३७॥
उसका नाम गौतम था। उसने बाण चलाकर लक्ष्य बेधनेका वहाँ बड़े यत्नके साथ अभ्यास किया। राजन्! गौतम भी दस्युओंकी तरह प्रतिदिन जंगलमें सब ओर घूम-फिरकर