भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1109

भगीरथरथाक्रान्तदेशान् गङ्गानिषेवितान् ।
ये चरन्ति महामीनास्तांश्च तस्यान्व कल्पयत् ॥ ४ ॥
राजा भगीरथके रथसे आक्रान्त हुए जिन भूभागोंमें श्रीगङ्गाजी प्रवाहित होती हैं, वहाँ गङ्गाजीके जलमें जो बड़े-बड़े मत्स्य विचरते हैं, उन्हींमेंसे कुछ मत्स्योंको लाकर राजधर्माने गौतमके लिये भोजनकी व्यवस्था की ॥ ४ ॥
वह्निं चापि सुसंदीप्तं मीनांश्चापि सुपीवरान् ।
स गौतमायातिथये न्यवेदयत काश्यपिः ॥ ५ ॥
कश्यपके उस पुत्रने अग्नि प्रज्वलित कर दी और मोटे-मोटे मत्स्य लाकर अपने अतिथि गौतमको अर्पित कर दिये ॥ ५ ॥
भुक्तवन्तं च तं विप्रं प्रीतात्मानं महातपाः ।
क्लमापनयनार्थं स पक्षाभ्यामभ्यवीजयत् ॥ ६ ॥
वह ब्राह्मण उन मत्स्योंको पकाकर जब खा चुका और उसकी अन्तरात्मा तृप्त हो गयी, तब वह महातपस्वी पक्षी उसकी थकावट दूर करनेके लिये अपने पंखोंसे हवा करने लगा ॥ ६ ॥