महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1110, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंततो विश्रान्तमासीनं गोत्रप्रश्नमपृच्छत । सोऽब्रवीद् गौतमोऽस्मीति ब्रह्म नान्यदुदाहरत् ॥ ७ ॥ विश्रामके पश्चात् जब वह बैठा, तब राजधर्मोने उससे गोत्र पूछा। गौतमने कहा—‘मेरा नाम गौतम है और मैं जातिसे ब्राह्मण हूँ।’ इससे अधिक कोई बात वह बता न सका ॥ ७ ॥
तस्मै पर्णमयं दिव्यं दिव्यपुष्पाधिवासितम् । गन्धाढ्यं शयनं प्रादात् स शिश्ये तत्र वै सुखम् ॥ ८ ॥ तब पक्षीने उसके लिये पत्तोंका दिव्य बिछावन तैयार किया, जो फूलोंसे अधिवासित होनेके कारण सुगन्धसे मँह-मँह महक रहा था। वह बिछावन उसे दिया और गौतम उसपर सुखपूर्वक सोया ॥ ८ ॥
अथोपविष्टं शयने गौतमं धर्मराट् तदा । पप्रच्छ काश्यपो वाग्मी किमागमनकारणम् ॥ ९ ॥ धर्मराज! जब गौतम उस बिछौनेपर बैठा तब बात-चीतमें कुशल कश्यपकुमारने पूछा—‘ब्रह्मन्! आप इधर किसलिये आये हैं? ॥ ९ ॥
ततोऽब्रवीद् गौतमस्तं दरिद्रोऽहं महामते । समुद्रगमनाकांक्षी द्रव्यार्थमिति भारत ॥ १० ॥ भारत! तब गौतमने उससे कहा—‘महामते! मैं दरिद्र हूँ और धनके लिये समुद्रतटपर जानेकी इच्छा लेकर घरसे चला हूँ’ ॥ १० ॥
तं काश्यपोऽब्रवीत् प्रीतो नोत्कण्ठां कर्तुमर्हसि । कृतकार्यो द्विजश्रेष्ठ सद्रव्यो यास्यसे गृहान् ॥ ११ ॥ यह सुनकर राजधर्मोने प्रसन्न होकर कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! अब आप वहाँतक जानेके लिये उत्सुक न हों, यहीं आपका काम हो जायगा। आप यहींसे धन लेकर अपने घरको जाइयेगा ॥ ११ ॥
चतुर्विधा ह्यर्थसिद्धिर्बृहस्पतिमंतं यथा । पारम्पर्यं तथा दैवं काम्यं मैत्रमिति प्रभो ॥ १२ ॥ ‘प्रभो! बृहस्पतिजीके मतके अनुसार अर्थकी सिद्धि चार प्रकारसे होती है—वंशपरम्परासे, प्रारब्धकी अनुकूलतासे, धनके लिये किये गये सकामकर्मसे और मित्रके सहयोगसे ॥ १२ ॥
प्रादुर्भूतोऽस्मि ते मित्रं सुहृत्त्वं च मम त्वयि । सोऽहं तथा यतिष्यामि भविष्यसि यथार्थवान् ॥ १३ ॥ ‘मैं आपका मित्र हो गया हूँ, आपके प्रति मेरा सौहार्द बढ़ गया है; अतः मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे आपको अर्थकी प्राप्ति हो जायगी’ ॥ १३ ॥
ततः प्रभातसमये सुखं दृष्ट्वाब्रवीदिदम् ।