भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1114, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1114

भीष्म उवाच

ततो राजा विममृशे कथं कार्यमिदं भवेत् । कथं वा सुकृतं मे स्यादिति बुद्ध्यान्वचिन्तयत् ॥ ६ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! यह सुनकर राक्षसराज मन-ही-मन विचार करने लगे कि अब किस तरह काम करना चाहिये? कैसे मुझे पुण्य प्राप्त हो सकता है? इस प्रकार उन्होंने बारंबार बुद्धि लगाकर सोचा और विचारा ॥ ६ ॥

अयं वै जन्मना विप्रः सुहृत् तस्य महात्मनः । सम्प्रेषितश्च तेनायं काश्यपेन ममान्तिकम् ॥ ७ ॥ तस्य प्रियं करिष्यामि स हि मामाश्रितः सदा । भ्राता मे बान्धवश्चासौ सखा च हृदयङ्गमः ॥ ८ ॥ वे मन ही-मन कहने लगे, 'यह केवल जन्मसे ही ब्राह्मण है; परंतु महात्मा राजधर्माका सुहृद् है। उन कश्यपकुमारने ही इसे यहाँ मेरे पास भेजा है; अतः उनका प्रिय कार्य अवश्य करूँगा। वह सदा मुझपर भरोसा रखता है और मेरा भाई, बान्धव तथा हार्दिक मित्र भी है ॥ ७-८ ॥

कार्तिक्यामद्य भोक्तारः सहस्रं मे द्विजोत्तमाः । तत्रायमपि भोक्ता च देयमस्मै च मे धनम् ॥ ९ ॥ स चाद्य दिवसः पुण्यो ह्यतिथिश्चायमागतः । संकल्पितं चैव धनं किं विचार्यमतः परम् ॥ १० ॥ 'आज कार्तिककी पूर्णिमा है। आजके दिन सहस्रों श्रेष्ठ ब्राह्मण मेरे यहाँ भोजन करेंगे। उन्हींमें यह भी भोजन कर लेगा, उन्हींके साथ इसे भी धन देना चाहिये। आज पुण्य दिवस है, यह ब्राह्मण अतिथिरूपसे यहाँ आया है और मैंने धन दान करनेका संकल्प कर ही रक्खा है। अब इसके बाद क्या विचार करना है?' ॥

ततः सहस्रं विप्राणां विदुषां समलंकृतम् । स्नातानामनुसम्प्राप्तं सुमहत् क्षौमवाससाम् ॥ ११ ॥ तदनन्तर भोजनके समय हजारों विद्वान् ब्राह्मण स्नान करके रेशमी वस्त्र और अलंकार धारण किये वहाँ आ पहुँचे ॥ ११ ॥

तानागतान् द्विजश्रेष्ठान् विरूपाक्षो विशाम्पते । यथार्हं प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १२ ॥ प्रजानाथ! विरूपाक्षने वहाँ पधारे हुए उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका शास्त्रीय विधिके अनुसार यथायोग्य स्वागत-सत्कार किया ॥ १२ ॥

बृस्यस्तेषां तु संन्यस्ता राक्षसेन्द्रस्य शासनात् । भूमौ वरकुशाः स्तीर्णाः प्रेष्यैर्भरतसत्तम ॥ १३ ॥

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