भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1115

भरतश्रेष्ठ! राक्षसराजकी आज्ञासे सेवकोंने जमीनपर उनके लिये कुशके सुन्दर आसन बिछा दिये ।। १३ ।।

तासु ते पूजिता राज्ञा निषण्णा द्विजसत्तमाः ।
तिलदर्भौदकेनाथ अर्चिता विधिवद् द्विजाः ।। १४ ।।
राजाके द्वारा सम्मानित वे श्रेष्ठ ब्राह्मण जब उन आसनोंपर विराजमान हो गये तब विरूपाक्षने तिल, कुश और जल लेकर उनका विधिवत् पूजन किया ।। १४ ।।

विश्वेदेवाः सपितरः साग्नयश्चोपकल्पिताः ।
विलिप्ताः पुष्पवन्तश्च सुप्रचाराः सुपूजिताः ।
व्यराजन्त महाराज नक्षत्रपतयो यथा ।। १५ ।।
उनमें विश्वेदेवों, पितरों तथा अग्निदेवकी भावना करके उन सबको चन्दन लगाया, फूलोंकी मालाएँ पहनायीं और सुन्दर रीतिसे उनकी पूजा की। महाराज! उन आसनोंपर बैठकर वे ब्राह्मण चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगे ।। १५ ।।

ततो जाम्बूनदीः पात्रीर्वज्राङ्का विमलाः शुभाः ।
वरान्नपूर्णा विप्रेभ्यः प्रादान्मधुघृतप्लुताः ।। १६ ।।
तत्पश्चात् उसने हीरोंसे जड़ी हुई सोनेकी स्वच्छ सुन्दर थालियोंमें घीसे बने हुए मीठे पकवान परोसकर उन ब्राह्मणोंके आगे रख दिये ।। १६ ।।

तस्य नित्यं सदाऽऽषाढ्यां माघ्यां च बहवो द्विजाः ।
ईप्सितं भोजनवरं लभन्ते सत्कृतं सदा ।। १७ ।।
उसके यहाँ आषाढ़ और माघकी पूर्णिमाको सदा बहुत-से ब्राह्मण सत्कारपूर्वक अपनी इच्छाके अनुसार उत्तम भोजन पाते थे ।। १७ ।।

विशेषतस्तु कार्त्तिक्यां द्विजेभ्यः सम्प्रयच्छति ।
शरद् व्यपाये रत्नानि पौर्णमास्यामिति श्रुतिः ।। १८ ।।
विशेषतः कार्तिककी पूर्णिमाको, जब कि शरद्-ऋतुकी समाप्ति होती है, वह ब्राह्मणोंको रत्नोंका दान करता था; ऐसा सुननेमें आया है ।। १८ ।।

सुवर्णं रजतं चैव मणीनथ च मौक्तिकान् ।। १९ ।।
वज्रान् महाधनांश्चैव वैदूर्याजिनराङ्कवान् ।
रत्नराशीन् विनिक्षिप्य दक्षिणार्थे स भारत ।। २० ।।
ततः प्राह द्विजश्रेष्ठान् विरूपाक्षो महाबलः ।
गृह्णीत रत्नान्येतानि यथोत्साहं यथेष्टतः ।। २१ ।।
येषु येषु च भाण्डेषु भुक्तं वो द्विजसत्तमाः ।
तान्येवादाय गच्छध्वं स्ववेश्मानीति भारत ।। २२ ।।
भारत! भोजनके पश्चात् ब्राह्मणोंके समक्ष बहुत-से सोने, चाँदी, मणि, मोती, बहुमूल्य हीरे, वैदूर्यमणि, रंकुमृगके चर्म तथा रत्नोंके कई ढेर लगाकर महाबली विरूपाक्षने उन श्रेष्ठ