महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1116, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मणोंसे कहा—'द्विजवरो! आपलोग अपनी इच्छा और उत्साहके अनुसार इन रत्नोंको उठा ले जायँ और जिनमें आपलोगोंने भोजन किया है, उन पात्रोंको भी अपने घर लेते जायँ'॥ १९—२२॥
इत्युक्तवचने तस्मिन् राक्षसेन्द्रे महात्मनि।
यथेष्टं तानि रत्नानि जगृहूर्ब्राह्मणर्षभाः॥ २३॥
उन महात्मा राक्षसराजके ऐसा कहनेपर उन ब्राह्मणोंने इच्छानुसार उन सब रत्नोंको ले लिया॥ २३॥
ततो महार्हैस्ते सर्वे रत्नैर्भ्यर्चिताः शुभैः।
ब्राह्मणा मृष्टवसनाः सुप्रीताः स्म ततोऽभवन्॥ २४॥
तत्पश्चात् उन सुन्दर एवं महामूल्यवान् रत्नोंद्वारा पूजित हुए वे सभी उज्ज्वल वस्त्रधारी ब्राह्मण बड़े प्रसन्न हुए॥
ततस्तान् राक्षसेन्द्रश्च द्विजानाह पुनर्वचः।
नानादेशगतान् राजन् राक्षसान् प्रतिषिध्य वै॥ २५॥
अद्यैकं दिवसं विप्रा न वोऽस्तीह भयं क्वचित्।
राक्षसेभ्यः प्रमोदध्वमिष्टतो यात माचिरम्॥ २६॥
राजन्! इसके बाद राक्षसराज विरूपाक्षने नाना देशोंसे आये हुए राक्षसोंको हिंसा करनेसे रोककर उन ब्राह्मणोंसे कहा—'विप्रगण! आज एक दिनके लिये आपलोगोंको राक्षसोंकी ओरसे कहीं कोई भय नहीं है; अतः आनन्द कीजिये और शीघ्र ही अपने अभीष्ट स्थानको चले जाइये। विलम्ब न कीजिये'॥ २५-२६॥
ततः प्रदुद्रुवुः सर्वे विप्रसंघाः समन्ततः।
गौतमोऽपि सुवर्णस्य भारमादाय सत्वरः॥ २७॥
कृच्छ्रात् समुद्धरन् भारं न्यग्रोधं समुपागमत्।
न्यषीदच्च परिश्रान्तः क्लान्तश्च क्षुधितश्च सः॥ २८॥
यह सुनकर सब ब्राह्मणसमुदाय चारों ओर भाग चले। गौतम भी सुवर्णका भारी भार लेकर बड़ी कठिनाईसे ढोता हुआ जल्दी-जल्दी चलकर बरगदके पास आया। वहाँ पहुँचते ही थककर बैठ गया। वह भूखसे पीड़ित और क्लान्त हो रहा था॥ २७-२८॥
ततस्तमभ्यगाद् राजन् राजधर्मा खगोत्तमः।
स्वागतेनाभिनन्दंश्च गौतमं मित्रवत्सलः॥ २९॥
राजन्! तत्पश्चात् पक्षियोंमें श्रेष्ठ मित्रवत्सल राजधर्मा गौतमके पास आया और स्वागतपूर्वक उसका अभिनन्दन किया॥ २९॥
तस्य पक्षाग्रविक्षेपैः क्लमं व्यपनयत् खगः।
पूजां चाप्यकरोद् धीमान् भोजनं चाप्यकल्पयत्॥ ३०॥