महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1119, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस पूर्वसंध्यां ब्रह्माणं वन्दितुं याति सर्वदा । मां वा दृष्ट्वा कदाचित् स न गच्छति गृहं खगः ॥ ६ ॥ ‘वे पक्षिप्रवर प्रतिदिन प्रातःकाल ब्रह्माजीकी वन्दना करनेके लिये जाया करते थे और वहाँसे लौटनेपर मुझसे मिले बिना कभी अपने घर नहीं जाते थे ॥ ६ ॥
उभे द्विरात्रिसंध्ये वै नाभ्यगात् स ममालयम् । तस्मान्न शुद्धयते भावो मम स ज्ञायतां सुहृत् ॥ ७ ॥ ‘आज दो संध्याएँ व्यतीत हो गयीं; किंतु वह मेरे घरपर नहीं पधारे, अतः मेरे मनमें संदेह पैदा हो गया है। तुम मेरे मित्रका पता लगाओ ॥ ७ ॥
स्वाध्यायेन वियुक्तो हि ब्रह्मवर्चसव्रर्जितः । तद्व्रतस्तत्र मे शंका हन्यात् तं स द्विजाधमः ॥ ८ ॥ ‘वह अधम ब्राह्मण गौतम स्वाध्यायरहित और ब्रह्मतेजसे शून्य था तथा हिंसक जान पड़ता था। उसीपर मेरा संदेह है। कहीं वह मेरे मित्रको मार न डाले ॥ ८ ॥
दुराचारस्तु दुर्बुद्धिरिङ्गितैर्लक्षितो मया । निष्कृपो दारुणाकारो दुष्टो दस्युरिवाधमः ॥ ९ ॥ ‘उसकी चेष्टाओंसे मैंने लक्षित किया तो वह मुझे दुर्बुद्धि एवं दुराचारी तथा दयाहीन प्रतीत होता था। वह आकारसे ही बड़ा भयानक और दुष्ट दस्युके समान अधम जान पड़ता था ॥ ९ ॥
गौतमः स गतस्तत्र तेनोद्विग्नं मनो मम । पुत्र शीघ्रमितो गत्वा राजधर्मनिवेशनम् ॥ १० ॥ ज्ञायतां स विशुद्धात्मा यदि जीवति मा चिरम् । ‘नीच गौतम यहाँसे लौटकर फिर उन्हींके निवास-स्थानपर गया था; इसलिये मेरे मनमें उद्वेग हो रहा है। बेटा! तुम शीघ्र यहाँसे राजधर्माके घरपर जाओ और पता लगाओ कि वे शुद्धात्मा पक्षिराज जीवित हैं या नहीं। इस कार्यमें विलम्ब न करो’ ॥ १० १/२ ॥
स एवमुक्तस्त्वरितो रक्षोभिः सहितो ययौ ॥ ११ ॥ न्यग्रोधं तत्र चापश्यत् कङ्कालं राजधर्मणः । पिताकी ऐसी आज्ञा पाकर वह तुरंत ही राक्षसोंके साथ उस वटवृक्षके पास गया। वहाँ उसे राजधर्माका कंकाल अर्थात् उसके पंख, हड्डियों और पैरोंका समूह दिखायी दिया ॥ ११ १/२ ॥
स रुदन्नगमत् पुत्रो राक्षसेन्द्रस्य धीमतः ॥ १२ ॥ त्वरमाणः परं शक्त्या गौतमग्रहणाय वै । बुद्धिमान् राक्षसराजका पुत्र राजधर्माकी यह दशा देखकर रो पड़ा और उसने पूरी शक्ति लगाकर गौतमको शीघ्र पकड़नेकी चेष्टा की ॥ १२ १/२ ॥
ततोऽविदूरे जगृहुर्गौतमं राक्षसास्तदा ॥ १३ ॥